गर्मी के दिन समाप्त होने को आए थे और हर किसीको बारिश का इंतजार था। बस के धुएँ और खड़खड़ाहट के बीच दो घंटों का रास्ता तय करते हुए सुधाजी आखिरकार अपने मायके पहुँच गईं। पिछले छह महीनों में वे गाँव नहीं आ पाई थीं। मन कुछ बेचैन था। भाई के घर पर टूट पड़े दुःख के पहाड़ को उन्होंने अब तक दूर से ही देखा था।
छह महीने पहले सुधाजी का सगा भतीजा—कुणाल—एक दुर्घटना में अचानक चल बसा था। महज़ सत्ताईस वर्ष की उम्र में कुणाल का यूँ चले जाना पूरे परिवार के लिए एक गहरा सदमा था। उसकी बीवी, शीतल तो जैसे बिखर सी गई थी। शादी को केवल एक वर्ष ही हुआ था और वह जीवन के इस पड़ाव पर अचानक बिल्कुल अकेली पड़ गई थी।
सुधाजी पुराने विचारों और कड़े अनुशासन वाली महिला थीं। धर्म-कर्म, रीति-रिवाज, रूढ़ियाँ और परंपराओं पर उनका गहरा विश्वास था। उनके अनुसार जिस स्त्री का पति गुजर जाए, उसे दुनिया से, सुख से और रंगों से दूर रहना चाहिए। उनके ससुराल में भी ऐसे ही कड़ा आचरण किया जाता और उस माहौल में रहकर सुधाजी को भी वही सही लगने लगा था।
बस स्टैंड से पैदल चलते हुए जब वे अपनी पुरानी लेकिन बड़ी सी हवेली के सामने पहुँचीं, तो उनके मन में कुणाल की यादों की भीड़ उमड़ पड़ी। घर में कदम रखने से पहले ही उन्होंने मन में एक तस्वीर बना ली थी—घर में पसरा हुआ शांत शोक, सफेद कपड़ों में उदास शीतल और दुःख में डूबी भाभी और भाई।
उन्होंने हवेली का लकड़ी का दरवाज़ा धकेला। कुंडी की वही हमेशा की परिचित आवाज़ हुई।
“भाभी…भैया…” सुधाजी ने आवाज़ लगाई।
तभी अंदर के कमरे से शीतल बाहर आयी। सुधाजी उसे देखती ही रह गईं। शीतल ने हल्के गुलाबी रंग की साफ-सुथरी और करीने से पहनी हुई साड़ी पहन रखी थी। बाल व्यवस्थित ढंग से बँधे हुए थे और सबसे महत्वपूर्ण बात—उसके माथे पर एक छोटी-सी, नाजुक लाल बिंदी सजी हुई थी। उसके चेहरे पर सुधाजी को शोक नहीं दिख रहा था। बल्कि सुधाजी को देखते ही उसके चेहरे पर एक प्रसन्न मुस्कान खिल उठी।
“अरे, बुआजी! आइए, आइए ना! कितने दिनों बाद आई हैं आप?” शीतल ने आगे बढ़कर सुधाजी के पैर छूते हुए खुशी से कहा।
सुधाजी वहीं जड़ होकर खड़ी रह गईं। उनकी नज़र शीतल के माथे की उस बिंदी पर टिक गई थी। उनके माथे पर तुरंत बल पड़ गए। आँखों में अविश्वास और गुस्सा एक साथ उमड़ आया।
“शीतल… तुम… तुमने माथे पर बिंदी लगा रखी है?” सुधाजी के मुँह से अनायास शब्द निकल पड़े।
शीतल ने शांत भाव से अपने माथे को छुआ। वह मुस्कुराई और बोली,
” हाँ बुआजी। आप बैठिए ना, सफर से थक गई होंगी। मैं आपका बैग अंदर कमरे में रख देती हूँ और आपके लिए अदरक डालकर बढ़िया चाय बनाती हूँ।”
शीतल सहजता से उनका भारी बैग उठाकर अंदर चली गई। उसका व्यवहार पहले जैसा ही हंसमुख था। घर में भी एकदम पहले की तरह ही चहक कर काम कर रही थी। सुधाजी वहीं दहलीज़ पर किसी मूर्ति की तरह खड़ी थीं। उनके मन में जमे पुराने विचारों को यह पहला झटका लगा था।
सोफे पर बैठने के बाद सुधाजी ने पूरे घर को बारीकी से देखा। बैठक में कुणाल की एक बड़ी तस्वीर लगी हुई थी। लेकिन उस पर हार नहीं चढ़ाया गया था। उलटे, तस्वीर के सामने एक छोटा-सा दीपक जल रहा था और कुणाल मुस्कुराता हुआ दिखाई दे रहा था। घर का वातावरण बोझिल या उदास नहीं था।
इतने में अंदर से सुनंदाजी बाहर आईं। वे कुणाल की माँ थीं। एक माँ ने अपना जवान बेटा खोया था, लेकिन सुनंदाजी के चेहरे पर शांत, परिपक्व और संयमित भाव थे।
” अरे सुधा, कब आई? पहले फोन कर देती ना, तुम्हारे भैया स्टेशन आ जाते तुम्हें लेने,” सुनंदाजी ने कहा।
” कोई बात नहीं भाभी। मैने सोचा के क्या ही भैया को परेशान करूं। लेकिन भाभी, मुझे इस घर में जो चल रहा है वो समझ में नहीं आ रहा।” सुधाजी ने अपना गुस्सा दबाने की कोशिश करते हुए कहा।
इतने में शीतल गरम चाय के दो कप लेकर बाहर आई। उसने बड़े प्यार से बुआजी के हाथ में चाय का कप दिया।
” बुआ, चाय लीजिए।”
“ठीक है, रख दो” सुधाजी ने रूखे स्वर में कहा।
चाय पीने के बाद सुधाजी के भाई—माधवजी—आ गए। वे खेत और बैंक से जुड़े कुछ कागज़ लेकर आए थे।
“शीतल बेटा, इधर आना ज़रा,” माधवजी ने आवाज़ लगाई।
“हाँ पापाजी, क्या हुआ?” शीतल तुरंत आगे आई और पूछा।
“यह देख, खेत की नई लीज़ के कागज़ आए हैं। मुझे इसमें लिखे बारीक कानूनी मामले समझ नहीं आते। तुम हर अच्छे से पढ़कर बताना तो।,” माधवजी ने कहा।
“हाँ पापाजी, मैं शाम तक ये सब पढ़ लेती हूँ और क्या करना है, बता दूँगी। और हाँ वो जो बैंक का काम अभि हुआ नहीं है वो कल जाकर कर लेते हैं,” शीतल ने बेहद समझदारी से जवाब दिया।
” ठीक है बेटा। तुम हो इसलिए मुझे इस उम्र में इन सबकी चिंता नहीं करनी पड़ती,” माधवजी ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा।
यह सब देखकर सुधाजी का खून खौल रहा था। एक विधवा लड़की घर में इस तरह खुलेपन से घूम रही थी, घर के फैसले ले रही थी, सास-ससुर उसके विचारों को इतना महत्व दे रहे थे और सबसे बड़ी बात—उसने विधवा होने के कोई भी पारंपरिक नियम नहीं अपनाए थे!
यह सब सुधाजी के पारंपरिक मूल्यों के बिल्कुल विपरीत था।
दोपहर में जब शीतल किसी काम से पड़ोस के घर गई, तो सुधाजी से रहा नहीं गया। वे सीधे रसोई में चली गईं, जहाँ सुनंदाजी रात के खाने की तैयारी कर रही थीं।
“भाभी!” सुधाजी की आवाज़ ऊँची थी। “मुझे आपसे ज़रा बात करनी है।”
सुनंदाजी ने शांत भाव से मुड़कर देखा।
” बोलो सुधा, क्या हुआ? इतनी नाराज़ क्यों लग रही हो?”
“मैं नाराज़ नहीं होऊँ तो क्या करूँ? भाभी, इस घर में ये क्या चल रहा है? मेरा तो दिमाग ही काम नहीं कर रहा!” सुधाजी हाथ हिलाते हुए बोलीं।
“किस बारे में बात कर रही हो तुम? मै कुछ समझी नहीं।” सुनंदाजी ने पूछा।
“किस बारे में मतलब? उस मनहूस लड़की शीतल के बारे में बात कर रही हूँ! कुणाल को गए सिर्फ छह महीने ही तो हुए हैं ना? और वह लड़की घर में कैसे रह रही है? माथे पर लाल बिंदी, अच्छी साड़ी, चेहरे पर मुस्कान… ये कैसी निशानियाँ हैं? क्या विधवा स्त्री इस तरह से रहती है?” सुधाजी का गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था।
सुनंदाजी ने हाथ में पकड़ी सब्ज़ी एक तरफ रख दी। वे शांत स्वर में बोलीं,
“सुधा, थोड़ा धीरे बोल। वह सुन लेगी।”
“सुनने दो ना! मैं चाहती हूँ कि वह भी सुने,” सुधाजी गुस्से में बोलीं।
फिर उन्होंने कहा,
“भाभी, वह आपकी बहू है। उसका पति इस दुनिया में नहीं है। उसे अपने दुःख का थोड़ा तो अहसास चाहिए न। पहले के समय में विधवा स्त्रियाँ कितनी सादगी से रहती थीं, एक कोने में रहती थीं। और यह तो ऐसे घूम रही है जैसे घर की मालकिन हो। भैया भी हर बात में उसकी सलाह लेते हैं। क्या यह हमारे खानदान को शोभा देता है?”
सुधाजी रुकी नहीं।
“आज बिंदी लगा रही है, कल नए कपड़े पहनेगी, हँसेगी-खिलेगी… और कल अगर उसने दूसरी शादी करने का विचार कर लिया तो? लोग हमारे परिवार के बारे में क्या कहेंगे? क्या तुम लोग अपने टूटे हुए घर की बदनामी करवाना चाहते हो? विधवा बहू को अपनी मर्यादा में रखना चाहिए। पर तुम लोगों ने उसे पूरी छूट दे रखी है!”
सुधाजी के इतने कठोर और चुभने वाले शब्द सुनने के बाद भी सुनंदाजी शांत रहीं। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं था, बल्कि एक गहरा मातृत्व और परिपक्व समझदारी थी।
सुनंदाजी ने सुधाजी का हाथ पकड़ा और उन्हें पास रखी लकड़ी की बेंच पर बैठा दिया।
“सुधा, तू जिस नज़र से शीतल को देख रही है, वह पुराने ज़माने वाली नज़र है। लेकिन मैं तो उसे बस एक माँ की नज़र से देखती हूँ।” सुनंदाजी बेहद कोमल लेकिन दृढ़ आवाज़ में बोलीं,
“माँ की नज़र से? यह क्या नई बात है? भाभी, वह आपकी बहू है, बेटी नहीं!”
“कुणाल चला गया, सुधा…मेरा इकलौता बेटा चला गया। मेरी गोद सुनी हो गई। लेकिन कुणाल चला गया इसलिए मैं इस जिंदा लड़की की ज़िंदगी भी खत्म कर दूँ?” सुनंदाजी की आवाज़ में एक पल के लिए दर्द उमड़ आया, लेकिन उन्होंने खुद को संभाल लिया।
सुधाजी मुट्ठियाँ भींचकर सुनती रहीं।
सुनंदाजी आगे बोलीं,
“कुणाल के जाने से शीतल की ज़िंदगी में जो अँधेरा छाया है, उसे हम रोज़ देखते हैं। जब वह रात में बंद दरवाज़े के पीछे तकिए में मुँह छिपाकर रोती है, तब मैंने उसकी रोने की आवाज़ सुनी है। लेकिन सुबह उठकर जब वह हमारे सामने आती है, तो हम बूढ़े सास-ससुर के टूटे हुए मन को संभालने के लिए अपने चेहरे पर मुस्कान ले आती है।
उसकी वह बिंदी, उसकी वह मुस्कान—यह उसकी कमजोरी नहीं है सुधा… यह उसके जीने की कोशिश है! और हम उससे जीने की यह कोशिश क्यों छीन लें?”
“लेकिन भाभी, समाज में कुछ नियम होते हैं या नहीं? लोग क्या कहेंगे?” सुधाजी ने अपना तर्क रखने की कोशिश की।
“लोग?” सुनंदाजी हँसीं, लेकिन उस हँसी में कड़वे अनुभव की टीस थी।
“कुणाल के जाने के बाद लोग दो दिन आए, दुःख जताने का दिखावा किया और चले गए। पर उसके बाद अपना दुख हम ही ढो रहे है। लोग कहा अब दुःख में शामिल होने आते है। और जहाँ तक मर्यादा और दूसरी शादी की बात है… तो सुधा, आज मैं तुम्हें बिल्कुल साफ-साफ बताती हूँ।”
सुनंदाजी ने सुधाजी की आँखों में आँखें डालकर कहा,
“बेटे के जाने के बाद हमें शीतल का ही सहारा है और उसे भी हमारा सहारा है। और कल अगर शीतल अपने जीवन को नए सिरे से शुरू करने का फैसला करे, अगर वह दोबारा शादी करने के बारे में सोचे, तो मैं और तुम्हारे भैया खुद उसके माँ-बाप बनकर उसका कन्यादान करेंगे! हमें इसमें ज़रा भी गलत या अनुचित नहीं लगेगा।”
अपनी भाभी की बात सुन सुधाजी सन्न रह गईं। उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। आज के जमाने में भी जहाँ गाँव में विधवा पुनर्विवाह की बात भी खुले तौर पर नहीं की जाती थी, उस समय उनकी भाभी स्वयं अपनी बहू की दूसरी शादी का समर्थन कर रही थीं।
“भाभी, आपको समझ आ रहा है कि आप क्या बोल रही हैं? घर की परंपरा…”
“परंपराएँ इंसान के लिए होती हैं सुधा, इंसान परंपराओं के लिए नहीं होता,” पीछे खड़े माधवजी की गंभीर आवाज़ सुनाई दी।
माधवजी कब अंदर आए थे, किसी को पता ही नहीं चला था। वे आगे आए और सुधाजी के पास बैठ गए।
माधवजी ने सुधाजी की ओर देखा। उनके चेहरे पर एक पिता की दृढ़ता थी।
“सुधा,” माधवजी बोले, “तुम्हे लगता है कि शीतल मर्यादा छोड़कर व्यवहार कर रही है? लेकिन मुझे बता, कुणाल के जाने के बाद इस बेजान सी हवेली को फिर से घर किसने बनाया?
जब मैं दुःख से टूट गया था, खेत पर जाना तक छोड़ दिया था, तब इसी शीतल ने मेरा हाथ पकड़कर मुझे बाहर निकाला था। उसने मुझसे कहा था, ‘पापाजी, कुणाल का सपना हमें पूरा करना है।’
यह बच्ची अब सिर्फ मेरी बहू नहीं रही, यह हमारी बेटी बन गई है।”
” लेकिन लोग बातें बनाएँगे,” सुधाजी ने आखिरी कोशिश की।
“बनाने दो बातें!” माधवजी दृढ़ता से बोले।
“जब कुणाल इस दुनिया में नहीं रहा, तब ये बच्ची अपने मायके जाकर रह सकती थी। अपनी जिंदगी को दोबारा से शुरू कर सकती थी। लेकिन इस दुःख की परिस्थिति में हमें छोड़कर नहीं गई। उसने हमारा दुःख ही अपना दुःख माना।
और अगर उसने माथे पर बिंदी लगा ली, तो इसमें किसी का क्या नुकसान है? कुणाल नहीं है पर वो तो अभी जिंदा है ना और उसे पूरी तरह जिंदगी जीने का अधिकार है।
अगर आज के समय में भी हम उसे उन पुराने अँधेरे रीति-रिवाजों में धकेलेंगे, तो क्या कुणाल की आत्मा को शांति मिलेगी?
कुणाल से उसे जितना प्रेम था, उतना ही उसे अपने जीवन को सम्मान के साथ जीने का अधिकार भी है।”
सुधाजी को इन जवाबों की बिल्कुल उम्मीद नहीं थी। उन्हें लगा था कि उनके भाई और भाभी भी उनकी बात से सहमत होंगे और शीतल को लगाम लगायेंगे । लेकिन यहाँ तो पूरा मामला ही अलग था। सास और ससुर दोनों अपनी बहू के पीछे ढाल बनकर खड़े थे।
सुधाजी का अहंकार आहत हो गया। उन्हें ये आधुनिक विचार और ये ‘आजादी’ बिल्कुल पसंद नहीं आ रही थी।
“ठीक है भैया” सुधाजी नाराज़ होकर उठ खड़ी हुईं। “आपका घर, आपके विचार! मुझे इसमें ज्यादा बोलने का हक नहीं है। लेकिन मुझे ये सब बिल्कुल भी ठीक नहीं लगा। मुझे यहाँ एक काम है। वह हो जाए तो मैं कल ही चली जाऊँगी।”
“सुधा, रुक ना, दो दिन और रुक जा,” सुनंदाजी ने विनती की।
“नहीं। मुझे इस माहौल में घुटन हो रही है। मैं अपना बैग लेती हूँ और कल दोपहर की बस से ही वापस चली जाती हूँ,” सुधाजी ने कड़े शब्दों में कहा।
अगले दिन सुधाजी ने अपना बैग उठा लिया। शीतल उन्हें रोकने के लिए आगे आई।
“बुआजी, मुझसे कोई गलती हुई क्या? आप कम से कम खाना खाकरतो जाइये।
सुधाजी ने शीतल की ओर ठंडी नज़र से देखा। बिना कुछ जवाब दिए वे मुड़ीं और वाड़े से बाहर निकल गईं। उनके मन में गुस्से और अविश्वास की दीवार अभी भी कायम थी।
सुधाजी के जाने के बाद आँगन में एक सन्नाटा छा गया। शीतल वहीं खड़ी थी। उसकी आँखों से अनायास दो आँसू बह निकले। उसने पिछली शाम बुआजी और सास-ससुर के बीच हुई बातचीत दरवाजे के बाहर से सुन ली थी।
उसे याद आया, जब कुणाल नहीं रहा, तब उसे लगा था कि उसकी ज़िंदगी अब खत्म हो गई है। उसने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया था। लेकिन उसके सास-ससुर उसके कमरे में आए थे। उन्होंने उसके हाथ अपने हाथों में लिए थे और कहा था,
“बेटा, कुणाल चला गया है तो इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हारा जीना खत्म हो गया। तुम हमारी बेटी हो। तुम हँसोगी तभी इस घर में खुशी महसूस होगी।”
आज जब बुआजीने उसके अस्तित्व, उसकी बिंदी और उसके जीने पर सवाल उठाए थे, तब उसके सास-ससुर ने जिस मजबूती से उसका पक्ष लिया, उससे शीतल का मन भर आया था।
वो धीरे-धीरे आगे बढ़ी और उसने सुनंदाजी को कसकर गले लगा लिया।
“माँजी…” शीतल आगे कुछ बोल नहीं पाई। उसका गला भर आया था।
सुनंदाजी ने उसे अपने पास खींच लिया और उसकी पीठ पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा,
“अरे पगली, रोती क्यों है? सुधा के विचार पुराने हैं। उसे जो लगा, उसने कह दिया। लेकिन तू मन में कुछ मत रखना।”
माधवजी भी पास आए और शीतल के सिर पर हाथ रखते हुए बोले,
“शीतल, इस दुनिया में कई तरह के लोग है और उनकी अपनी अलग अलग राय भी होती है। पर लोग क्या कहते हैं, इसे महत्व नहीं देना चाहिए। और तुम हमारी बेटी जैसी हो। हमारे लिए लोगों की बात से कही ज्यादा जरूरी तुम्हारी खुशी है। तुम कभी भी खुद को अकेला मत समझना।”
शीतल ने अपने सास-ससुर की ओर देखा। उसकी आँखों में अब जो आँसू थे, वे दुःख के नहीं, बल्कि खुशी और गर्व के थे।
आज के स्वार्थी और पुरानी रूढ़ियों से भरे समाज में उसे ऐसे सास-ससुर मिले थे, जो मातापिता की तरह उसके साथ खड़े थे।
उसने अपने आँसू पोंछे। उसके माथे पर लगी वह छोटी-सी लाल बिंदी अब भी चमक रही थी—दुख और अकेलेपन पर विजय पाने वाली एक नई सुबह की उम्मीद की तरह!
शीतल एक बार फिर मन ही मन मुस्कुराई। वह अंदर गई और कुणाल की तस्वीर के सामने जल रहे दीपक को ठीक किया।
उसने मन ही मन कहा,
“कुणाल, तुम जहाँ कहीं भी हो, खुश रहोगे… क्योंकि तुम्हारी यह शीतल अकेली नहीं है, और वह कभी हार नहीं मानेगी।”
घर के आँगन में सूखने के लिए डाले गए फूल हवा के साथ हिल रहे थे और हवेली की दीवारों पर एक नई, प्रकाशमय सुबह फैल रही थी।
समाप्त।
©® आरती निलेश खरबडकर
