माँ का प्यार

माँ का प्यार

आज सिया को बहुत तेज़ बुखार था। फिर भी वह रसोई में खड़ी होकर रोटियाँ बना रही थी। राघव ये भलीभांति जानता था कि उसकी तबीयत ठीक नहीं है। फिर भी राघव ने सुबह उससे बड़े सख्त लहजे में पूछा,

“मेरा टिफिन तैयार हुआ क्या?”

उसकी बात सुनकर सिया की आँखें भर आईं। मन में खयाल आया के इनके दिल में मेरे लिए प्यार न सही पर शायद कोई दयाभाव भी नहीं है। उसके अकेलेपन का एहसास और गहरा हो गया।

राघव हमेशा उससे सख्ती से पेश आता। शादी को सिर्फ छह महीने हुए थे, लेकिन इन छह महीनों में वे दिल से कभी एक नहीं हो पाए थे। राघव सिर्फ अपनी जरूरत के लिए सिया के पास आता। बाते ही सिर्फ जरूरत के हिसाब से करता। सिया के मन को तो उसने कभी टटोला ही नहीं था। ऐसा लगता मानो वह उस पर कोई पुराना गुस्सा निकाल रहा हो।

राघव की ज़िंदगी में एक ऐसी कमी थी, जो कितने भी साल बीत जाएँ, कभी पूरी नहीं हो सकती थी। वह कमी थी — उसकी माँ।माँ के गुजर जाने के बाद उसकी ज़िंदगी में सब कुछ तो था… लेकिन फिर भी कुछ भी नहीं था। रात को देर से वह ऑफिस से घर आता, थककर सोफे पर बैठ जाता और अनजाने में उसकी नज़र रसोई की तरफ चली जाती। जहां पहले उसकी मां दिखाई देती।पहले उसकी माँ दरवाज़े पर खड़ी रहती थी।

“आ गया बेटा? रुक… गरम रोटी बनाती हूँ…”

उस आवाज़ से ही राघव का पेट भर जाता। लेकिन मां के जाने के बाद अब घर में सिर्फ सन्नाटा था… और उस सन्नाटे में माँ की याद और भी बड़ी लगती थी।

राघव जब बहुत छोटा था तब ही उसके पिता गुजर गए थे। उसकी माँ ने दूसरों के घर कम करके राघव की परवरिश की। बरसात में टपकते हुए घर में वह एक हाथ से बर्तन रखती और दूसरे हाथ से उसे सीने से लगाकर सुलाती।

“तू बस पढ़ाई कर… बड़ा आदमी बन… अफसर बन… फिर मुझे कुछ नहीं चाहिए।”

वह हमेशा मुस्कुराकर उससे कहती।

लेकिन राघव जानता था… उस मुस्कान में न जाने कितना दर्द छुपाए बैठी थी मां। उसने कई बार देखा था कि माँ खुद भूखी रहकर उसकी थाली में आखिरी रोटी रख देती थी। एक बार तो स्कूल की फीस भरने के लिए माँ ने अपनी इकलौती सोने की चूड़ी बेच दी थी।उस दिन राघव रोते हुए बोला था,

“माँ… मैं बड़ा होकर तुम्हें बहुत सुख दूँगा। तुम्हें कोई काम नहीं करने दूँगा।

” माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था,

“मेरा सुख तो तू ही है बेटा…तू खुश तो तेरी ये मांभी खुश”

समय आगे बढ़ता गया। राघव पढ़ने में बहुत होशियार था। उसकी पढ़ाई पूरी हुई और नौकरी के इंटरव्यू शुरू हो गए। माँ रोज भगवान के सामने दिया जलाती।“हे भगवान… मेरे बेटे को अच्छी नौकरी देना। उसके हिस्से में मेरी तरह दुख मत आने देना…”

लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। एक रात अचानक माँ के सीने में दर्द होने लगा। राघव उन्हें तुरंत अस्पताल लेकर गया। बारिश की रात थी। सड़क पर पानी भरा हुआ था। माँ स्ट्रेचर पर लेटी थी और फिर भी उसका हाथ कसकर पकड़कर कह रही थी,

“डर मत बेटा… मैं ठीक हूँ… और अगर मुझे कुछ हो भी जाए, तो तू दुखी मत होना… तुझे खुश देखकर मैं आराम से इस दुनिया से विदा लूंगी”

माँ की बातें सुनकर राघव का दिल और भर आया, लेकिन उसने माँ को यह महसूस नहीं होने दिया। अस्पताल पहुँचने के बाद डॉक्टरों ने माँ की जाँच की। जब डॉक्टर बाहर आए, तो उनके चेहरे पर ही जवाब था।

“हमने बहुत कोशिश की… लेकिन आपकी माँ को बचा नहीं सके…”

उस एक रात ने राघव की ज़िंदगी जैसे अंधेरे में धकेल दी। माँ के अंतिम संस्कार के बाद वह पहली बार घर में अकेला बैठा था। बचपन से उसकी पूरी दुनिया सिर्फ उसकी माँ थी। माँ ने ही उसकी पूरी ज़िंदगी को अपने प्यार से भर रखा था। आज उसकी ज़िंदगी में एक ऐसी खाली जगह बन गई थी, जो कभी नहीं भर सकती थी।

चूल्हे के पास माँ की पुरानी शॉल पड़ी थी। उसने उसे सीने से लगा लिया और ज़िंदगी में पहली बार छोटे बच्चे की तरह फूट-फूटकर रो पड़ा।

“माँ… तुम्हें थोड़ा और रुकना चाहिए था ना… मुझे तुम्हें बहुत खुश रखना था…”

लेकिन मौत कहा किसी के लिए रुकती है। मां के गुजरने के सिर्फ दो महीने बाद ही उसे एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई। ऑफर लेटर हाथ में लेते ही उसकी आँखों में आँसू आ गए। क्योंकि जिसकी सबसे ज़्यादा जरूरत थी उस खुशी को बाँटने के लिए… वही इंसान अब इस दुनिया में नहीं था। उसका मन अपराधबोध से भर गया।वह घर आया। माँ की तस्वीर सामने रखी और काँपती आवाज़ में बोला,

“माँ… तुम्हारी मेहनत रंग लाई… मुझे अच्छी नौकरी मिल गई… तुम कहती थी ना… मेरा बेटा बड़ा आदमी बनेगा… देखो, ये मेरी पहली सफलता है मां।”

तस्वीर में माँ जैसे मुस्कुरा रही थी। तभी से अपराधबोध उसके मन में हमेशा के लिए बस गया।

कुछ साल बाद किसी रिश्तेदार की मध्यस्थता से उसकी शादी सिया से हुई। सिया अनाथ थी। उसकी बुआ ने उसे पाला था। वह बुआ के रहमो करम कर उनके घर रहती। उनके घर का सारा काम करती। पर अपनी बुआ से उसे कभी माँ के प्यार की गर्माहट नहीं मिली। बुआ बस दो वक्त का खाना देती और कभी-कभार त्योहार पर कपड़े मिल जाते। कई बार तो घर में बचा हुआ बासी खाना सबसे पहले सिया को ही खाना पड़ता। बुआ की बेटियों के पुराने कपड़े भी उसी के हिस्से आते।

उन्होंने किसी तरह उसे बारहवीं तक पढ़ाया और अपने सर से उसकी जिम्मेदारी उतारने के लिए जल्दबाज़ी में जो रिश्ता आया उसके साथ सियाकी शादी कर दी।इस तरह से सिया राघव की ज़िंदगी में आई थी।

वह प्यार करने वाली, समझदार और घर संभालने वाली लड़की थी। बस दो प्यार भरे शब्दों के लिए तरसती थी। लेकिन माँ के जाने के बाद राघव बहुत खामोश सा हो गया था। उसके स्वभाव में एक अजीब कठोरता आ गई थी। उसकी ज़िंदगी में सिर्फ एक ही स्त्री महत्वपूर्ण थी — उसकी माँ। बाकी रिश्तों के लिए तो जैसे उसके पास भावनाएँ ही नहीं बची थीं।

वह हमेशा काम में डूबा रहता। घर आकर चिड़चिड़ा हो जाता। कभी सिया से प्यार या अपनेपन से दो बातें भी नहीं की थी उसने। सिया कितनी भी थकी हो, वह कहता,

“तुम दिनभर घर पर ही रहती हो… इतना क्या थक जाती हो?”वह उसके हर काम में गलती निकालता। उसके हिसाब से इस दुनिया में उसकी माँ जैसा कोई नहीं था। सिया बीमार हो तब भी उसे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि उसके मन में हमेशा यही चलता रहता कि “मेरी माँ ने तो इससे भी ज़्यादा सहा है। तो क्या ये इतना भी नहीं सह सकती”

वह हर बात की तुलना अपनी माँ के दुखों से करने लगा था। और उसी में सिया का अस्तित्व धीरे-धीरे खोता जा रहा था। उन अनगिनत पलों ने सिया की आँखों की चमक को हमेशा के लिए छीन लिया था। वह शांत सी हो गई थी। कम बोलने लगी थी। पहले की तरह हँसना बंद कर दिया था। वह बातें करती… लेकिन सिर्फ जरूरत भर की। राघव को अब तक उसके इस बदलाव का एहसास भी नहीं हुआ था। न ही उसे कोई फिक्र थी।

एक बार सिया की बुआ के घर कोई कार्यक्रम था। इसलिए वह दो दिन के लिए वहाँ गई हुई थी। दो दिन बाद राघव उसे लेने वहाँ पहुँचा। वैसे वह बुआ के घरवालों से ज्यादा बात नहीं करता था।संयोग से उस दिन मदर्स डे था। बुआ की दोनों बेटियाँ मदर्स डे के लिए कमरे की सजावट कर रही थीं। वे दोनों प्यार से अपनी माँ से केक कटवा रही थीं, उसके साथ तस्वीरें खिंचवा रही थीं। बुआ भी प्यार से उन्हें निहार रही थी। उनकी बलाएं ले रही थी। उन्हें आशीर्वाद दे रही थी।यह देखकर राघव को भी अपनी माँ की याद आ गई।

तभी बुआ की नज़र रसोई के दरवाज़े पर खड़ी सिया पर पड़ी। बुआ उसे देखकर बोली,

“अरे ऐसे क्या खड़ी है? जल्दी से किचन समेट ले… फिर घर जा… राघव जी कबसे इंतज़ार कर रहे हैं…”

उसी समय राघव की नज़र रसोई से हॉल की तरफ देख रही सिया पर पड़ी। उसकी आँखों में आँसू थे, जिन्हें वह बड़ी मुश्किल से रोक रही थी। उसके चेहरे का दर्द राघव पहली बार देख रहा था… महसूस कर रहा था।शायद उसे भी अपनी माँ की याद आ गई थी। राघव ने सुना था कि जब सिया सिर्फ एक साल की थी, तभी उसकी माँ इस दुनिया से चली गई थी।

अचानक उसे एहसास हुआ कि कम से कम उसे अपनी माँ का प्यार कुछ सालों तक तो मिला। उसका बचपन माँ की ममता की छांव में सुरक्षित बीता। लेकिन सिया तो बचपन से ही माँ के प्यार से बोझल रही है।अगर मैं खुद इतना दुखी हूँ… तो सिया के दुख का क्या? वह मेरे एक कटाक्ष के लिए तरसती रही…एक बिना मां की बच्ची को मैंने जाने अनजाने इतना दुख दिया…”

यह सोचकर वह भीतर तक टूट गया।बुआ की बेटियाँ हॉल में फोटो खिंचवा रही थीं और सिया रसोई में काम कर रही थी। राघव रसोई में गया और सिया का हाथ पकड़कर बोला,

“काम रहने दो… तुम्हारी बुआ की बेटियाँ कर लेंगी… चलो, हमें देर हो रही है…”आज पहली बार राघव ने हक से उसका हाथ पकड़ा था। उस स्पर्श से सिया भीतर तक खिल उठी। उसकी आंखे चमक उठी। पहली बार उसे राघव के साथ इतना सुरक्षित महसूस हो रहा था। वह भी उसका हाथ पकड़कर चुपचाप बैग लेकर उसके साथ चल दी।

बुआ और उनकी बेटियाँ बस उन्हें देखती रह गईं। उन्हें पता था कि राघव सिया के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करता, इसलिए वे जानबूझकर उसके सामने सिया को और नीचा दिखाती थीं। लेकिन आज राघव का बदला हुआ व्यवहार देखकर उन्हें समझ आ गया था कि अब से सिया के साथ उसका पति हमेशा खड़ा रहेगा।

घर पहुँचते ही थकी हुई सिया तुरंत सो गई। लेकिन उस रात राघव काफी देर तक सो नहीं पाया। सिया उसके पास सोई हुई थी। उसके थके चेहरे पर बाल बिखरे हुए थे। हाथों पर बर्तन धोने के साबुन से पड़ी हुई खुरदरी त्वचा साफ दिखाई दे रही थी।अचानक उसे अपनी माँ दिखाई देने लगी। वही थकी हुई आँखें… वही खुद को भुलाकर परिवार के लिए जीने की आदत…उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

उसने पहली बार सोती हुई सिया का हाथ बड़े ही प्यार से अपने हाथों में लिया।उसके मन में बस एक ही बात चल रही थी —“माँ के लिए मैं कुछ नहीं कर पाया… लेकिन माँ के प्यार से वंचित सिया को अब कभी कोई दुख नहीं होने दूंगा। उसकी ज़िंदगी में माँ की कमी तो पूरी नहीं कर सकता… लेकिन उसकी बाकी की ज़िंदगी प्यार, सम्मान और खुशियों से भर दूँगा…”

अगली सुबह जब सिया उठी, तो रसोई से चाय की खुशबू आ रही थी। वह हैरानी से बाहर आई। राघव चाय बना रहा था।उसने पूछा,

“अरे, आप रसोई में क्या कर रहे हैं? मैं बना देती ना…”

राघव ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखें रातभर जागने से लाल हो गई थीं।“मुझे माफ कर दो, सिया…” इतना कहते ही उसकी आवाज़ भर आई ।

“मैंने तुम्हें कभी समझने की कोशिश ही नहीं की…” वो आगे बोला।

सिया कुछ नहीं बोली। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहे।

“ऐसा माफी मत माँगिए… मैं ठीक हूँ… मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं है…” वह धीरे से बोली।

उस दिन उसने राघव की आँखों में पछतावा देखा। धीरे-धीरे राघव बदलने लगा। वह सिया से आराम करने को कहता, उसकी पसंद पूछता, रात को उसके लिए चाय बनाता। एक बार तो वह उसे साड़ी दिलाने भी ले गया। साड़ी चुनते समय सिया की आँखों में आँसू आ गए। क्योंकि इतने सालों बाद पहली बार किसी ने उसकी पसंद पूछी थी।उस रात राघव माँ की तस्वीर के सामने खड़ा हुआ। उसने तस्वीर पर जमी धूल साफ की और बोला,

“माँ… मैं तुम्हें सुख नहीं दे पाया… लेकिन अब तुम्हारी तरह जिंदगी जीने वाली एक और स्त्री को कभी रोने नहीं दूँगा।”

माँ की तस्वीर को देखकर उसे महसूस हुआ के मां को उसकी बेटी से सुकून मिला है।…माँ को असली खुशी कभी महंगी चीज़ों में नहीं चाहिए थी। वह सिर्फ इतना चाहती थी — उसका बेटा एक अच्छा इंसान बने।और उस दिन… कई सालों बाद… राघव सच में बड़ा हो गया था। उम्र से नहीं बल्कि विचारों से भी।

समाप्त।

©®आरती निलेश खरबड़कर।

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