बिखरते हुए रिश्ते

बिखरते हुए रिश्ते

नेहा खिड़की से बाहर देख रही थी। शाम की धूप धीरे-धीरे ढल रही थी, लेकिन उसके मन में ज़रा भी शांति नहीं थी। पेट पर हाथ फेरते हुए उसने गहरी साँस ली। अंदर बच्चे की हल्की-सी हलचल महसूस हुई और पल भर के लिए उसके होंठों पर मुस्कान आ गई।


“तू है ना… बस इतना ही काफी है,” वह खुद से बुदबुदाई।


नेहा और निखिल की शादी को अब एक साल हो चुका था। शुरुआती जीवन सादा, सीधा और प्यार भरा था। निखिल एक निजी कंपनी में अच्छे पद पर काम करता था। वह अपने काम में बहुत ईमानदार था, लेकिन स्वभाव से थोड़ा कम बोलने वाला था। बचपन में पिता के गुजर जाने के बाद उसने बहुत मेहनत से पढ़ाई की और आज अपनी जिंदगी संभाली थी। उसकी एक बड़ी बहन थी, जिसकी शादी पास के ही एक गाँव में हुई थी।


उसकी माँ – जानकी जी – गाँव में अकेली रहती थीं। पति के जाने के बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन निखिल और उसकी बहन कीर्ति के लिए समर्पित कर दिया था। इसलिए निखिल के लिए उसकी माँ किसी देवता से कम नहीं थीं। जब निखिल को नौकरी मिली, तो घर में उसकी शादी की जल्दी शुरू हो गई। नेहा को निखिल की माँ ने ही उसके लिए पसंद किया था। शादी के कुछ ही दिनों बाद निखिल, नेहा को लेकर शहर में रहने आ गया। इसलिए नेहा को सास का ज्यादा साथ नहीं मिला था। उसने कई बार सास को अपने पास शहर आने के लिए कहा, लेकिन वे कभी नहीं आईं।


अब जब नेहा को गर्भवती होने की खबर मिली, तो घर में खुशी का माहौल था। सास को पता चला तो उन्हें बहुत आनंद हुआ। जानकी जी ने फोन पर ही नेहा को हजारों हिदायतें देना शुरू कर दिया—


“ध्यान रखना… ज्यादा काम मत करना… समय पर खाना-पीना…”
नेहा को लगा, “सासू माँ मेरी कितनी चिंता करती हैं। काश वे यहाँ मेरे साथ होतीं।”


डॉक्टर ने शुरू से ही कहा था कि उसका गर्भ थोड़ा नाज़ुक है। पहला बच्चा, कम हीमोग्लोबिन, लगातार थकान—सबका खास ध्यान रखना था। शहर में उसे अकेलापन महसूस होता था। निखिल सुबह जल्दी निकल जाता और रात को देर से आता। उसे लगा, “अगर माँ आ जाएँ तो सहारा मिलेगा… इस समय उनकी मदद बहुत जरूरी है।”


इसलिए एक दिन उसने निखिल से माँ को बुलाने की बात की।
“नेहा, तुम्हें सच में लगता है कि माँ आ जाएँ तो तुम्हें अच्छा लगेगा?” निखिल ने पूछा।


“हाँ निखिल… इस हालत में मुझे उनका साथ चाहिए। हमारे बच्चे की देखभाल माँ से बेहतर कौन करेगा?” ये कहते हुए नेहा की आँखों में विश्वास था।


उसके आग्रह पर जानकी जी शहर आ गईं। पहले दो दिन सब ठीक रहा। लेकिन तीसरे दिन से माहौल बदलने लगा। शहर की सुविधाएँ देखकर उन्हें लगने लगा कि उनका बेटा मेहनत करता है और बहू उसकी कमाई पर ऐश करती है। उन्हें अपनी बेटी कीर्ति याद आती, जो गाँव में घर के कामों में लगी रहती थी। उसे इतनी सुखसुविधा कभी नहीं मिली थी। इतना ही नहीं, गाँव की भयंकर गर्मी में भी उसे साड़ी पहनकर रहना पड़ता। अपनी बहू को शहर में सुखसुविधा और अपनी मर्जी से पहनते-ओढ़ते देखकर बहू के लिए अब उनका नजरिया बदलने लगा।


“नेहा, मुझे सुबह पाँच बजे चाय चाहिए होती है। ये हमेशा की आदत है मेरी,” उन्होंने एक दिन नेहा से कहा।


अगले दिन सुबह पाँच बजे दरवाजे पर दस्तक हुई। नेहा गहरी नींद में थी। दरवाजा खोला तो सामने सास खड़ी थीं।


“माँ… आप इतनी सुबह? कुछ चाहिए आपको?”


“मैंने कहा था ना, मुझे पाँच बजे चाय चाहिए होती है,” जानकी जी बोलीं।


“तो बना लीजिए ना माँ,” नेहा ने धीमे से कहा।


“बहू के घर में होते हुए मैं काम करूँ? क्या ये शोभा देता है? तुम अपनी सास के लिए इतना भी नहीं कर सकती?” सासू माँ ने कहा।


ये सुनकर नेहा की नींद उड़ गई। उसने चाय बनाई। फिर पूरे दिन सास काम बताती रहीं। उसे दोपहर में आराम भी नहीं मिला।


धीरे-धीरे यह रोज़ का नियम बन गया।
“सिर्फ पोहा नहीं, आज उपमा बनाओ।”
“एक सूखी सब्जी और एक ग्रेवी वाली सब्जी बनाओ।”
“फर्श बैठकर पोंछो।”

ऐसी सूचनाएं उसे दिनभर मिलती रहती।
नेहा पूरे दिन रसोई में खड़ी रहती। सूजे हुए पैर, दर्द करती कमर, भारी सिर। एक दिन उसने धीरे से अपनी सास से कहा,


“माँ, मैं बहुत थक जाती हूँ। डॉक्टर ने आराम करने को कहा है।”
जानकी जी बोलीं,


“हमारे ज़माने में हम खेतों में काम करते थे। कुछ नहीं हुआ। काम करने से डिलीवरी नॉर्मल होती है। आजकल की औरतें तो सीज़ेरियन करवा लेती हैं।”
नेहा चुप हो गई।

फिर एक दिन उसने निखिल से कहा,
“घर में एक कामवाली रखते हैं।”


तो निखिल बोला,
“माँ है ना घर में, वो मदद करती ही है। उनके होते हुए तुम्हें काम के बारे में सोचने की क्या जरूरत है?”


असल में सास मदद नहीं करती थीं, उल्टा काम बढ़ा देती थीं। लेकिन नेहा कह नहीं पाती। वह अंदर ही अंदर टूट रही थी।

एक दिन उसे चक्कर आया और वह सोफे पर गिर पड़ी। उसकी तबीयत काफी बिगड़ गई। ब्लड प्रेशर बढ़ गया। उसे तुरंत डॉक्टर के पास ले गए। डॉक्टर ने उसे चेक किया और घरवालों को समझाया कि उसे सख्त आराम करने की जरूरत है—कोई काम नहीं, कोई तनाव नहीं। ये सब सुनकर नेहा को लगा कि अब सासू माँ समझ गई होंगी और अपना रवैया बदल देंगी।


लेकिन अगले ही दिन सुबह पाँच बजे फिर दरवाजा खटखटाया गया।
“डॉक्टर कुछ भी कहते हैं। बेड रेस्ट मतलब सीज़ेरियन को बुलावा,” जानकी जी बोलीं।


नेहा ने सब कुछ निखिल को बताया, पर उसने माँ का ही साथ दिया। सुनकर नेहा टूट गई। अब वह अकेले में रोती। क्योंकि उसे लग रहा था कि अब कोई उसका दुख समझने वाला नहीं है।


फिर एक दिन वह फिर से थका हुआ महसूस करने लगी। फिर भी हिम्मत करके रसोई का काम कर रही थी। पर अचानक चक्कर खाकर जमीन पर गिर पड़ी।
“माँ… निखिल…” उसने चीखकर कहा और बेहोश हो गई।


उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर ने कहा,
“अगर समय पर नहीं लाते तो माँ और बच्चे दोनों की जान को खतरा था।”
उन्होंने डाँटते हुए कहा,
“गर्भवती स्त्री कोई काम करने की मशीन नहीं होती। जिसे नॉर्मल डिलीवरी के नाम पर उसकी क्षमता से ज्यादा काम कराया जाए।”
डॉक्टर ने फिर से घरवालों को चेतावनी दी।


ये सुन जानकी जी की आँखों में आँसू आ गए। उन्हें अहसास हो गया के नेहा के लिए उनका रवैया उसके साथ साथ उसके बच्चे की जान को भी खतरे में डाल रहा था। निखिल भी शर्मिंदा था। उसने जानते बुझते अपनी बीवी की हालत को अनदेखा कर दिया था।


“नेहा, मुझे माफ कर दो,” निखिल बोला।
“बहू, मुझे माफ कर दो,” जानकी जी ने भी कहा।


लेकिन अब नेहा का मन आहत हो चुका था। वह मायके चली गई। कुछ महीनों बाद उसने एक प्यारी-सी बेटी को जन्म दिया। सभी खुश थे।


कुछ समय बाद वह वापस अपने घर आई। अब जानकी जी कभी-कभी शहर आतीं। नेहा उनसे अच्छे से पेश आती, लेकिन मन की कड़वाहट पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी। जानकी जी को भी एहसास था कि बहू ने उनमें माँ देखी, लेकिन उन्होंने उसे सिर्फ बहू समझा।


पर अब रिश्ते में दरार पड़ चुकी थी। और शायद वो दरार पूरी जिंदगी भर नहीं पाएगी।


“हमारे ज़माने में हमने बहुत काम किया” — यह तर्क हर स्त्री पर लागू नहीं होता। हर गर्भावस्था अलग होती है। डॉक्टर की सलाह और माँ-बच्चे की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण होती है।


समाप्त।


©® आरती निलेश खरबडकर

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *