
” माँ…डॉक्टर ने मेघा को आराम करने के लिए कहा है…डॉक्टर ने कहा हैंके ज्यादा चलना फिरना मेघा और बच्चे के लिए अच्छा नहीं है।” सौरभ ने माँ को समझाते हुए कहा।
” डॉक्टर का तो काम ही है ये बताना। आराम करने के लिए कहते हैं और फिर नॉर्मल डिलिवरी नहीं हो पाती। वैसे भी घर में काम ही क्या होते है ? आजकल हर चीज़ के लिए मशीन का उपयोग करते है…हमारे वक्त तो हमें कही दूर कुएं से पानी लाना पड़ता, और न जाने कितने ही काम करने पड़ते। लेकिन हमें कभी कुछ नहीं हुआ। आजकल की लड़कियों को सिर्फ काम ना करने के बहाने चाहिए।” माँ ने कहा।
” माँ…मैं सोच रहा हूँ कि कुछ महीनों के लिए घर के कामों के लिए कोई हेल्प रखी जाए… मेघा को अब आराम की जरूरत है…आजकल कम करने के बाद वो थक जाती है…” सौरभ ने अपनी माँ से कहा।
” कही तुम ये तो नहीं कहना चाहते हो के मै तुम्हारी बीवी से दिनभर काम ही करवाती हु। सिर्फ हम तीनों के कम होते है घर में। और कम भी क्या बस खाना बनाना, झाड़ू पूछा करना और बर्तन धोना। कपड़े भी तो मशीन में ही धोती है। और घर में नौकरानी लगाने की क्या जरूरत है। पैसे क्या पेड़ पर उगते है। तुम्हारी बीवी को अगर लगता है के उसे बहुत ज्यादा काम है तो मुझे बता दो। मैं खुद कामवाली बन जाती हु उसके लिए।” मां ने गुस्से में कहा।
अब सौरभ करता भी तो क्या ? मां कुछ समझने को तैयार ही नहीं थी। मेघा का अभी सातवां महीना चल रहा था। और कुछ मेडिकल कंडीशन के चलते डॉक्टर ने उसे पूरी तरह से आराम करने को कहा था। लेकिन सौरभ की मां को लगा के डॉक्टर तो ऐसे ही कह देते है। पर बहु अगर काम करेगी तो नॉर्मल डिलीवरी होने के ज्यादा आसार रहेंगे। आराम करेगी तो पक्का सिजेरियन ही होगा।
शादी के चार साल बाद मेघा और सौरभ के जीवन में ये खुशखबरी आई थी। इस खबर से दोनों बहुत खुश थे। मेघा के साथ रहने के लिए सौरभ ने माँ को गांव से बुलवाया था। सासू माँ की आने से मेघा भी बहुत खुश थी। लेकिन मेघा की सास एक पुरानी सोच हो महिला थी।
जब सौरभ के माता पिता की शादी हुई थी तो उनके माली हालात कुछ ठीक नहीं थे। इसीलिए सौरभ की मां ने बहुत ज्यादा तंगी में दिन गुजारे थे। फिर किस्मत ने ऐसी करवट ली के उनके दोनों बच्चे सरकारी नौकरी में लग गए।छोटा बेटा सरकारी स्कूल में शिक्षक था और अपने माता – पिता के पास गया में ही रहता। पर सौरभ को नौकरी के चलते मुंबई में रहना पड़ता।
सौरभ के माता पिता कभी कभी उसके पास रहने आ जाते। मिलिंद भी छुट्टियों में मेघा के साथ गांव चल जाता। लेकिन इस बात मां पहली बार पिताजी के बिना एक लंबे वक्त के लिए रहने आई थी। प्रेग्नेंसी की शुरुवात में ही डॉक्टर ने मेघा की स्थिति को नाजुक बताते हुए उसे आराम करने की सलाह दी थी। इसीलिए मेघा ने एक कामवाली को अपने हेल्प के लिए रखा था। पर सौरभ की मां ने आते ही उस कामवाली की
छुट्टी कर दी। उनके हिसाब से घर के कामों के लिए कामवाली को रखना मतलब पैसों की बर्बादी थी। उन्होंने मेघा को कहा के तुम अच्छे से अपने काम करोगी तभी बच्चा स्वस्थ रहेगा और डिलीवरी नॉर्मल होगी।
सासू सुबह पांच बजे उठ जाती थीं। और उठते ही उन्हें चाय चाहिए होती थी। इसलिए वो सुबह ही मेघा को नींद से जाग देती। इसी कारण मेघा का दिन अब सुबह पांच बजे से शुरू हो जाता था। दिनभर काम करके मेघा पूरी तरह से थक जाती थी। लेकिन मेघा की सास कहती कि काम करने से नॉर्मल डिलिवरी होगी। मेघा ने उन्हें समझाने की कोशिश की पर इससे सासूमां मेघा पर गुस्सा हो गई। इसीलिए मेघा फिर कुछ कह न पाई।
मेघा घर के काम करने में थक जाती। सौरभ उसकी हालत समझ रहा था। इसीलिए उसने मां से कामवाली रखने की बात की थी। पर ये बात सुनकर मां सौरभ पर भड़क गई। मां ने बचपन में उसके लिए कई त्याग किए थे। और सौरभ कॉन्स बात का अहसास था। इसीलिए वो मां के सामने ज्यादा कुछ बोल न पाता।
सौरभ की मां ने अपनी गृहस्थी के शुरुवाती दौर में बहुत तंगी सही थी। ऊपर से उनकी सास का स्वभाव भी बहुत कठोर था। इसीलिए सौरभ की मां को उनकी गर्भावस्था में हर भी आराम नहीं मिल पाया था। जीवनभर अपनी सास का अत्याचार सहा था। इसीलिए उनके मन में भी अपनी बहु के लिए वही कड़वापन आ गया था। मेघा को वो उसी सास वाली नजर से देखती। मेघा ने उनमें अपनी मां को देखने की काफी कोशिश की। पर सासूमां मेघा को कभी अच्छे से समझ ही नहीं पाई थी।
मेघा की तबियत अब और ज्यादा खराब रहने लगी थी। और जबसे आठवां महीना लगा था मेघा को अब कुछ अच्छा महसूस नहीं हो रहा था। नतीजतन मेघा बीमार पड़ गई। जब उसकी तबियत ज्यादा बिगड़ी तो मेघा अस्पताल ले जाया गया। उसका चेकअप करने के बाद डॉक्टर को उसकी तबियत बिगड़ने का कारण समझ में आ गया था।
डॉक्टर ने पहले तो मेघा का इलाज किया। मेघा को जब थोड़ा ठीक लगने लगा तो डॉक्टर ने मेघा की सासूमां को केबिन में बुलाया। उन्होंने मेघा की सास को मेघा की मेडिकल कंडीशन अच्छे से समझाई । साथ ही ये भी बताया के अगर मेघा को अभी अच्छा आराम न मिल पाया तो ये उनकी बहु के साथ साथ आने वाले बच्चे की जान भी खतरे में डाल सकती है। साथ ही ये भी समझाया के हर स्त्री का मां बनने का अनुभव एक जैसा नहीं हो सकता। इसीलिए गर्भावस्था में हर माँ को अलग-अलग अनुभवों का सामना करना पड़ता है। डॉक्टर की बात सुनकर सासूमां को सच में उनकी गलती का अहसास हुआ और उन्हें समझ में आया कि मेघा के मामले में वे सच में गलत थीं।
उनकी सास ने उनके साथ जो किया वही व्यवहार वो अपनी बहु के साथ कर रही थी इस बात का अहसास उन्हें हो गया था। जिस प्रकार अपनी सास के लिए उनके मन में जिंदगीभर कड़वाहट थी उसी प्रकार मेघा के मन में भी उनके लिए जिंदगीभर कड़वाहट रहेगी इस विचार ने उनको झकझोर दिया।
मेघा के बीमार चेहरे को देखकर उनके मन की माँ फिर से जागी। उन्होंने उस दिन से मेघा का अपनी बेटी की तरह ख्याल रखना शुरू कर दिया। उसकी जरूरतों का ध्यान रखा। उसके लाड-प्यार किए। माँ में आए बदलाव को देखकर सौरभ और मेघा दोनों बहुत खुश थे। कुछ दिनों बाद मेघा ने एक प्यारे बच्चे को जन्म दिया। और पूरे परिवार में खुशी छा गई।
किसीने सच ही कहा है, कभी-कभी अपने स्वभाव में किया गया एक छोटा सा परिवर्तन भी हमारा जीवन बदलकर रख देता है।…
समाप्त।
©®आरती निलेश खरबडकर
