“योग्यता”

“योग्यता”

” आपके घरवालों को कुछ समझ में आता है या नहीं। जेठानी जी बोर्ड मेम्बर बनने के योग्य नहीं है। रसोईघर के बाहर उन्होंने दुनिया देखी भी नहीं होगी कभी। किसी के सामने क्या बोलना है ? कैसे बोलना है इस बात की भी समझ नहीं है उनमें। और उन्हें सीधे बोर्ड मेम्बर बनाने जा रहे है पापाजी।” नंदिनी गुस्से में बोलती जा रही थी।

” क्या तुम थोड़ी देर के लिए चुप रह सकती हो। कबसे बोली ही जा रही हो। और पापा ने कुछ सोच समझकर ही ये फैसला लिया होगा। और हमारे घर के सारे फैसले पापा ही लेते है। तो मुझे नहीं लगता के हमे पापा के फैसले पर कोई उंगली उठानी चाहिए।” राज ने समझाते हुए कहा।

” पर पापाजी को घर में से किसीको बोर्ड मेंबर बनाना था तो मै थी ना। उन्हें इसके लिए मेरा विचार करना चाहिए था। मै जेठानी जी से ज्यादा पढ़ीलिखी हु। चार लोगो के सामने कैसे उठना बैठना है मै जानती हूं। और मुझ जैसी हर तरह से काबिल बहु के होते हुए पापाजी जेठानी जी को कैसे बोर्ड मेम्बर बना सकते है ?” नंदिनी चिढ़ कर बोल रही थी।

” ओह…अब मै समझा। तुम इस बात से गुस्सा नहीं हो के भाभी को बोर्ड मेम्बर बनाया जा रहा है। पर तुम इस बात पे गुस्सा हो के तुम्हारे होते हुए भाभी को ये सम्मान मिल रहा है। पर तुम्हे समझना पड़ेगा के भाभी इस घर की बड़ी है। और तुम्हे अपने आप की तुलना उनसे नहीं करनी चाहिए।” राज ने कहा।

” लेकिन मुझे लगता है के भाभी ये ज़िम्मेदारी नहीं संभाल पाएगी। ये सब उनकी समझ से परे है। जेठानी जी को कुछ समझ में ही नहीं आएगा।” नंदिनी बोली।

” देखो…बोर्ड मेम्बर चाहे जिसे भी बनाए। हमारे लिए जरूरी ये है के हमारा शिक्षा संस्थान आगे बढ़े। और उसके लिए हम सबको मेहनत करनी चाहिए। फिर हम किसी बड़े पद पर हो या नहीं। इसीलिए अब तुम ये सब कर सोचो। परसो ऑफिस में मीटिंग है और हमे भी वह जाना है।” राज ने समझाते हुए कहा। नंदिनी फिर आगे कुछ बोल न पाई।

लेकिन मन ही मन वो ये स्वीकार नहीं कर पा रही थी के उसकी गवार जेठानी को उसके ससुरजी बोर्ड मेम्बर बनाने वाले है। उसके हिसाब से ये उसके लिए अपमानजनक था। उसके सोच लिया था के वो इस बारे के पापाजी से बात करेगी। नंदिनी दो साल पहले मिश्रा जी के घर की छोटी बहु बनके आयी थी। नंदिनी अच्छी पढ़ी लिखीं थी। बहुत अमीर घरबकी बेटी थी और अपने साथ काफी सारा स्त्रीधन भी लाई थी। साथ ही दिखने मै भी नंदिनी बहोत ज्यादा सुंदर थी। नंदिनी जितनी ज्यादा सुंदर थी उतना ही उसे अपने आप पर घमंड था। उसकी नजर में वो सबसे ज्यादा काबिल थी। बाकी लोगों को वो हमेशा अपने से कमतर समझती।
 
कुसुम उसकी जेठानी थीं। दिखने में सुंदर, घर के काम में निपुण और स्वभाव से विनम्र। कुसुम जब छोटी थी तभी उसके माता पिता का देहांत हो गया था। इसीलिए बचपन से ही वो अपने मामा के घर रहती। एक दिन मिश्रा जी ने किसी शादी समारोह में कुसुम को देख लिया। उसके बारे में किसी से पूछकर उन्हे कुसुम के बारे में पता चला। उन्होंने कुसुम के मामा से अपने बेटे अभय के लिए कुसुम का हाथ मांग किया। वसुधा के मामा ने भी बड़ी खुशी से कुसुम और अभय की शादी के लिए हामी भर दी।

  रामनारायण मिश्रा जी शहर के जाने माने लोगो में से एक थे। उनकी खुद की शिक्षा संस्थाएं थी। और उनकी शिक्षा संस्थानों का बड़ा नाम भी था आसपास के शहरों में। शहर के लोग उनकी इज्जत किया करते। इसीलिए उनके घर में कुसुम की शादी कराना उनके मामा के लिए शान की बात थी।

अभय अपने पापा का बड़ा सम्मान करता और उन्होंने उसके लिए कुसुम को चुना तो उसने भी अपने पापा के फैसले को खुशी खुशी स्वीकार किया। कुसुम को देखने के बाद तो उसे पहली नजर में ही वो भा गई थी। अभय और कुसुम की शादी बड़ी धूमधाम से हुई। रामनारायण मिश्रा जी स्वभाव से पड़े सख्त थे पर दिल के बहुत नरम थे।

उनकी पत्नी जानकी जी भी पूरे घर की जिम्मेदारी बड़े अच्छे से निभाती। रामनारायण जी ज्यादातर अपने काम मे और समाज सेवा में व्यस्त रहते। लेकिन जानकी जी ने घर के काम को संभालते हुए रामनारायण जी का पूरा पूरा साथ दिया था। कुसुम जब घर की बहु बनके आती तो जानकी जी ने शुरू में बड़ी सख्ती दिखाई थी।

पर जहां कहीं जरूरत पड़ी उन्होंने उसे प्यार से समझाया भी था। उन्होंने कुसुम को घर के शिष्टाचार बड़े अच्छे से सिखाए। और कुसुम भी हाहितभी जल्द सबकुछ सीख भी गई। उसके अच्छे स्वभाव ने सभी घरवालों का दिल भी जीत लिया था।

इतने बड़े घर की बहु बनने के बाद भी कुसुम का रहन सहन बहुत सादा था। और वो घर का कोई भी छोटा मोटा काम करते हुए कभी भी हिचकिचाती नहीं थी। उसकी जरूरतें भी काफी सीमित थी। घर में लगभग सभी कामों के लिए नौकर थे लेकिन कुसुम अपना काम खुद करना ही पसंद करती। साथ ही उसे सबके लिए अच्छे अच्छे व्यंजन बनाकर खिलाना बड़ा अच्छा लगता। इसीलिए वो ज्यादातर किचन में ही रहती। अभय को भी कुसुम की ये सादगी बहुत अच्छी लगती।

   लेकिन नंदिनी के लिए सब कुछ उल्टा ही था। उसकी शादी को सिर्फ चार महीने हुए थे। शादी के बाद उसने घर में ज्यादा काम नहीं किया। उसे लगता था कि वह अमीर घर की बेटी है, इसलिए उसे काम करने की जरूरत नहीं है। उसे लगता था कि कुसुम भाभी गरीब घर की है, इसलिए वह ज्यादा काम करती है। नंदिनी छोटी होने के बावजूद कुसुम से अपना काम करवा लेती। हालांकि कुसुम नंदिनी को छोटी बहन की तरह ही समझती। उसकी पसंद का ध्यान रखती। लेकिन नंदिनी को लगता था कि वह हर मामले में कुसुम भाभी से बेहतर है और उनका और कुसुम भाभी का कोई मेल नहीं है।

इसलिए इस घर में हर सम्मान उसे ही मिलना चाहिए। रामनारायण जी ने कुसुम को उनके शिक्षा संस्थान में बोर्ड मेम्बर के रूप में शामिल करने का फैसला कबसे सुनाया था तबसे नंदिनी को अपमानित सा लगने लगा था। उसे लगा था के वो इतनी काबिल और शिक्षित होने के बाद भी उसकी जगह उसकी साधारण सी जेठानी को ये कैसे मिल सकता है। उसने रामनारायण जी से बात करने की ठान ली।

  थोड़ी देर बाद जब रामनारायण जी बाहर से आए तो नंदिनी सीधे उनके सामने जाकर खड़ी हो गई। उसे देखकर रामनारायण जी बोले।

” अरे नंदिनी बेटा, कुछ कहना है तुम्हे ??”

” हा पापाजी, मुझे कुछ पूछना है आपसे। ” नंदिनी ने कहा।

” पूछो।” रामनारायण जी बोले।

” मैंने सुना है के आपने जेठानी जी को स्कूल का बोर्ड मेंबर बनाने का सोचा है।” नंदिनी ने पूछा।

” हा, तुमने सही सुना है।” रामनारायण जी ने कहा।

” पर क्यूं पापाजी ? जेठानी जी ही क्यों ?” नंदिनी ने पूछा।

” क्योंकि हमें लगता है के वो ये ज़िम्मेदारी अच्छे से संभाल सकती है।” रामनारायण जी ने जवाब दिया।

” वो रसोई अच्छे से संभाल सकती है इसका मतलब ये नहीं के वो बाहर भी अच्छे से संभाल सके सब। उन्हें किसी से बात करना भी नहीं आता। चार लोगो के बीच में रहन सहन कैसा होना चाहिए ये भी नहीं समझतीं। उन्होंने आज तक रसोईघर के बाहर कदम भी नहीं रखा। वो सिर्फ मान से बड़ी हैं, इसलिए आप उन्हें बड़ा पद दे रहे हैं। लेकिन इसके लिए वो योग्य नहीं हैं। “नंदिनी ने कहा।

” बड़ी बहु की योग्यता क्या है और क्या नहीं है ये हमे तुमसे जानने की जरूरत नहीं है छोटी बहु।” रामनारायण जी ने दो टूक जवाब दिया।

” पर पापाजी…ये सब मै हमारी भलाई के लिए ही बोल रही हु। आप ही सोचिए के वो अगर ये जिम्मेदारी अच्छे से naii उठा पाई तो कितनी जगहसाई होगी हमारी।” नंदिनी बोली।

” तुम बहुत ज्यादा बोल रही हो छोटी बहु। बड़ी बहु अगर तुम्हारी बाते चुपचाप सुन लेती है इसका मतलब ये नहीं के वो मूर्ख है। या उसको कुछ समझ में नहीं आता है। वो तुमसे हमेशा विनम्रता से बात करती है क्योंकि उसका स्वभाव ही विनम्र है। उसको रसोई मै काम करने की कोई जरूरत नहीं है पर सिर्फ और सिर्फ़ घरवालों को उनकी पसंद का खाना अपने हाथो से बनाकर खिलाने के लिए वो रसोई में काम करती है। वो सबसे प्यार करती है इसीलिए सबके लिए ये सब काम करती है।” रामनारायण जी ने नंदिनी को समझाते हुए कहा।

“कुसुम भाभी घर का सारा काम अच्छे से करती हैं, इसलिए उन्हें बाहर के काम की जिम्मेदारी तो नहीं दे सकते ना पापाजी…मैं पढ़ी-लिखी हूं…मुझे पता है के घर के बाहर काम को कैसे संभालना होता है…इसीलिए मुझे लगता है के आपको भाभी की जगह मुझे बोर्ड मेंबर बनाना चाहिए था।
भाभी घर की जिम्मेदारी संभालेगी और मै बोर्ड मेम्बर के तौर पर हमारे एजुकेशनल बोर्ड की मेंबर बनकर सारी जिम्मेदारी संभालूंगी।” नंदिनी ने अपने मन को बात का दी।

“देखो छोटी बहू…बड़ी बहु कम बात करती है, इसका मतलब ये नहीं कि उसे बोलना नहीं आता…तुम्हारे इस घर में आने से पहले हम बड़े-बड़े फैसले लेते समय कुसुम की सलाह लिया करते थे…और उसने हमें जो सलाह दी, वो कभी गलत साबित नहीं हुई…और रही बात बड़ी बहु के पढ़ी लिखीं होने की…तुम्हें क्या लगता है…वे कितनी पढ़ी-लिखी होंगी…” रामनारायण जी ने नंदिनी से सवाल किया।

“इसमें पूछना क्या पापाजी। उन्हें देखकर साफ पता चलता है के उन्होंने दसवीं या बारहवीं तक पढ़ाई की होगी।” नंदिनी ने कहा।

नंदिनी और रामनारायण जी के बातों के बीच ही कुसुम भी वहां आ गई। उसे ये जानते देर नहीं लगी के यह उसीके बारे में बात हो रही है। पर कुछ ना बोलते हुए वो चुपचाप वहां खड़ी रही। कुसुम को देखकर रामनारायण जी ने कहा।

“यही तो तुमने गलती कर दी छोटी बहू। किसी इंसान के रहन-सहन से उसके चरित्र का अंदाजा नहीं लगाना चाहिए। कुसुम बहु ने पॉलिटिकल साइंस में पीएचडी किया हैं। शादी से पहले ग्रेजुएट करने के बाद कुसुम बहु ने शादी के बाद घर की जिम्मेदारियां संभालते हुए अपनी पीएचडी की डिग्री पूरी की।लेकिन कुसुम बहु ने कभी भी अपने पढ़ेलिखे होने का दिखावा नहीं किया। हमने उसे कहा भी के उसे हमारे काम को संभालने के लिए हमारे ऑफिस को ज्वॉइन कर लेना चाहिए।  पर उसने कहा के अभी वो घर संभालना चाहती है। तो हमने भी उसके फैसले का सम्मान किया। पर जब जब हमने उससे सलाह मांगी उसने हमें हमेशा ही अच्छी सलाह दी। और अब वो बाहर काम करने के लिए पूरी तरह से तैयार है। उस अपनी शिक्षा का कोई अहंकार नहीं है। बाकी शिक्षा के कारण उसमें विनम्रता आई है। और वो किसी भी काम को छोटा या बड़ा नही समझती। और यही उसकी विशेषता है। उसका यही गुण उसे औरो से अलग बनाता है। और इसीलिए इस पद के लिए वो सही चुनाव है।” रामनारायण जी ने कहा।

कुसुम भाभी ने पीएचडी किया है ये सुनकर पहले तो नंदिनी को झटका ही लगा। सीधी साधी दिखने वाली, काम बोलने वाली, रसोई में काम करनेवाली उसकी जेठानी इतनी पढ़ी लिखीं है ये उसने कभी सोचा ही नहीं था। क्योंकि उस अबतक यही लगता के पढ़ेलीखे लोग साधारण काम करते नहीं है। लेकिन आज उसकी ये गलतफहमी दूर हो गई थी। पढ़ी लिखीं होने के बाद भी इतनी विनम्रता रखने वाली जेठानी के आज पहली बार उसे गर्व महसूस हो रहा था। उसने कुसुम भाभी की तरफ देखा और कहा।

” कुसुम दीदी, मुझे माफ कर दीजिए। मैंने आजतक कई बार आपको नीचा दिखाने की कोशिश की। मुझे अपने मां बाप की अमीरी, अपने रहन सहन और शिक्षा पर बड़ा अहंकार था। लेकिन अगर मै सही लोगो को पहचान कर ही नहीं पाऊंगी तो ऐसी शिक्षा का फ़ायदा ही क्या है। आपने आजतक मेरी किसी बात का बुरा नहीं माना ये आपका बड़प्पन है। और मैंने आपको अपने से कमतर समझा ये मेरा बचपना है। मुझे माफ कर दीजिए दीदी।” नंदिनी ने सर झुकाकर कहा।

” तुम माफी मत मांगो नंदिनी। तुम मेरे लिए मेरी छोटी बहन की तरह ही हो। मै कभी भी तुमसे नाराज नहीं थी। और ना कभी तुमसे नाराज हो सकती हु। और तुम सच ही कह रही थी। हमारे एजुकेशनल बोर्ड की बोर्ड मेंबर तुम बनो या मै। एक ही बात है।”

फिर पापाजी की तरफ देखकर कुसुम ने कहा।

” पापाजी, आप नंदिनी को ही बोर्ड मेम्बर नियुक्त कर लीजिए। वो बहुत अच्छे से काम करेगी ये विश्वास है मुझे।”

” नहीं दीदी, मुझे नहीं लगता के अभी इस जिम्मेदारी के लिए मै तैयार हु। मुझे अभी बहुत कुछ सीखना है। ये जिम्मेदारी आप ही संभालिए दीदी।” नंदिनी ने कहा।

” आगे जाकर काम की सारी जिम्मेदारी तुम बच्चों को ही संभालनी है। पर उसके लिए तुम्हे पहले पूरी तरह से तैयार हो पड़ेगा। अपने आपको उस जिम्मेदारी के योग्य बनाना पड़ेगा।

” एकदम सही बात कह रहे है आप।” जानकी जी भी वहापर आ गई और हंसते हुए कहने लगी के

“पर जो भी हो। अच्छी बात ये है के आज हमारी दोनों बहु समझदार हो गई है।”

” तो इसी बात पे कुछ मीठा है जाए ?” रामनारायण जी ने जानकी जी की तरफ देखते हुए कहा।

” जी हा। जरूर।” जानकी जी ने कहा। पर उनकी बात पूरी होने से पहले ही देवरानी जेठानी एक दूसरे का हाथ पकड़े हुए रसोई मै कुछ मीठा बनाने चल पड़ी। रामनारायण जी और जानकी जी अपनी दोनों बहुओ को देखकर खुश हो रहे थे।

समाप्त।

©®आरती खरबड़कर.

 

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