मुझे माँ चाहिए।
“सुनो…बाहर कोई तुमसे मिलने आया है” पत्नी ने राजेश को आवाज़ दी।
राजेश, जो अपने मोबाइल फोन में खोया था, स्क्रीन से नजरे हटाए बिना ही बोला।
“अरे आ रहा हूं। दो मिनट रुकने को बोलो।”
इतना कहने के बाद वो फिर से अपने मोबाइल में व्यस्त हो गया। पर पांच मिनट बाद जब फिर से उसकी पत्नी ने उसे आवाज लगाई तो वो बाहर गया।
बाहर गेट के सामने एक तीस साल का युवक हाथ बंधे और गर्दन झुकाए उसके इंतजार में खड़ा था। उसके पहनावे से राजेश को लगा कि वह किसी गरीब परिवार से है और शायद कोई काम या पैसा मांगने आया होगा।
“हमारे पास अभी कोई काम नहीं है…तुम कहीं और काम ढूंढ लो…” राजेश ने कहा और अंदर जाने लगा।
“रुकिए सर…मैं आपके पास काम मांगने नहीं आया था…मुझे आपसे कुछ और काम है।” उसने कहा।
“तुम्हे भला मुझसे क्या काम…?” राजेश ने पूछा.
“सर…मैं मन्नू…मनोज अवस्थी…मैं आपके पुराने मकान के पास रहता हूं…मैंने सुना है कि आप वह घर बेचने जा रहे हैं।” उसने कहा।
“हाँ…मैं बेचना तो चाह रहा हूँ।” राजेश ने कहा।
“सर…मैं वह मकान खरीदना चाहता हूं…आप वह मकान कितने में बेचना चाहेंगे ?” उसने पूछा।
“देखो…घर पुराना है…बहुत छोटा है… साथ ही यह शहर से थोड़ा बाहर है…इसलिए ज्यादा नहीं लेकिन छह लाख मे तो आराम से बिक जाएगा। अगर तुम छह लाख रुपयों का प्रबंध कर सको तो मैं तुम्हे घर बेचने को तैयार हूं।” राजेश ने कहा।
“सर…कुछ कम हो सकता है तो देखिए ना।” मन्नू ने आशाभारी नजरों से देखते हुए कहा।
” नहीं…मै इसमें कुछ भी कम नहीं कर सकता। तुम अगर इतनी रकम का इंतजाम कर सकते हो तो ही मैं मकान तुम्हे बेचूंगा। वरना अभी मुझे मकान बेचने की कोई खास जरूरत नहीं है।” राजेश ने कहा।
“ऐसा नहीं है सर…मैं पैसो का इंतजाम कर लूंगा…बस मुझे कुछ दिन का समय दीजिए।” मन्नू ने कहा।
“ठीक है…तुम मुझे बताओ के तुम पैसों का इंतजाम कबतक कर सकते हो…तुम्हे पैसों का इंतजाम करने में अगर बहुत ज्यादा वक्त लगता है तो फिर मुश्किल है…” राजेश ने कहा।
“नहीं सर…मैं वो घर खरीदना चाहता हूं…मैं टोकन के लिए कुछ रकम भी अपने साथ लाया हूं…और बाकी रकम दो महीने में चुका दूंगा…।” मन्नू ने कहा।
यह कहते हुए राजेश ने अपने पास मौजूद बैग से इक्कीस हजार रुपए निकालकर राजेश को दे दिये।
राजेश को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि घर खरीदने कोई इतनी जल्दी आ जायेगा। क्योंकि उसका घर पुराना था। शहर के बाहर तीन कमरों का पुराना सा मकान। वो भी पिछले आठ साल से बंद था। राजेश साल में एकाध बार ही पुराने घर पर जाता।
राजेश ने घर बेचने का फैसला इसीलिए कर लिया था क्योंकि घर काफी दिनों से बंद था। और इसी कारण घर की हालत भी काफी बुरी हो गई थी। शुरू में एक दो ग्राहक घर खरीदने आए भी थे, पर उन्होंने घर काफी कम कीमत पर खरीदना चाहा। इसलिए राजेश ने अभीतक घर बेचा नहीं था। वरना वो तो कब का बेच देता। राजेश चाहता था के घर बेच के उसे कम से कम पांच लाख की रकम मिले। लेकिन उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि मन्नू उसकी मुंह मांगी रकम देने को इतनी जल्दी तैयार हो जाएगा। मन ही मन इस बारे सोचकर राजेश खुश हो रहा था।
मन्नू ने जैसे कहा था कि वो दो महीने में बाकी की रकम जमा कर देगा वैसे ही उसने सारी रकम जमा कर भी दी। राजेश ने भी फिर ज्यादा देर किए बिना मकान उसके नाम पर ट्रांसफर करवा दिया। रजिस्ट्री पूरी होते ही मन्नू मकान मालिक बन गया।
घर बेचने के बाद कुछ ही दिनों में राजेश को उसके पुराने मकान के पास ही कोई काम याद आया। कम खत्म करने के बाद उसे न जाने क्यों अपने पुराने घर को देखने की इच्छा हुई। वो ये भी जानना चाहता था के मन्नू ने घर में कुछ बदलाव किए है या नहीं। वो घर के पास आया।उसने घर देखा तो वो घर देखकर वो हैरान रह गया। मन्नू ने सच में घर को बहुत ही अच्छे से सजाया था। घर के सामने एक शेड बनवाया था। बाजू में जो खाली जगह थी उसमें बड़ा ही सुंदर बागीचा बनवाया था। घर के आसपास भी बहुत साफसफाई हुई थी। घर को खूबसूरत रंगी से रंगवाया था। राजेश को तो जैसे अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं हो रहा था।
जैसे ही राजेश घर की ओर जाने के लिए बढ़ा, उसने देखा कि एक बूढ़ी औरत एक बच्चे की उंगली पकड़े हुए घर से बाहर आ रही है।उस महिला को देखकर राजेश के होश उड़ गए। क्योंकि वह उसकी माँ थी। उसकी सगी मां। और मां का हाथ पकड़ के चल रहा बच्चा शायद मन्नू का बेटा था। उन दोनों के पीछे ही मन्नू की पत्नी भी मां को आवाज लगती हुई बाहर आई।
वो लोग आपस में ऐसे बात कर रहे थे जैसे कि वो सच में उन्हीं की मां हो। राजेश की मां भी उनके साथ बहुत खुश नजर आ रही थी। वही माँ जिसे राजेश चार साल पहले वृद्धाश्रम छोड़ आया था। पहले तो वह कभी कभी जाकर मां का हालचाल पूछ लेता था पर पिछले दो साल से उसने मां का हालचाल भी नहीं पूछा था। आज अचानक अपनी मां को पुराने घर में देखकर वह अचंभित रह गया।
ये सब देखकर उसे अपने बचपन की यादें याद आई। वह इसी घर में बड़ा हुआ था। उसका बचपन इन्हीं तीन कमरों में बीता। वह अपने माता-पिता की इकलौता बेटा था। राजेश के पिता की आर्थिक स्थिति कुछ ज्यादा अच्छी नहीं थी। इसलिए राजेश के बाद उन्होंने किसी दूसरी संतान के बारे में नहीं सोचा। उन्होंने सोचा के इसी बच्चे को अच्छे से पढ़ा लिखा के काबिल बनाएंगे।
उन्होंने राजेश के पालन पोषण में कभी कोई कमी नहीं आने दी। उसे अच्छे स्कूल में पढ़ाया। उसकी हर मांग को पूरा किया। लेकिन राजेश को लगा कि ये सब तो सभी के मां बाप उनके बच्चों के लिए करते ही है। बाद में राजेश ने अच्छी पढ़ाई की। उसे जल्दी ही अच्छी नौकरी मिल गयी। माता-पिता ने उसके लिए को सपने देखे वो सच हो गए थे।
लेकिन राजेश के पिता बेटे की तरक्की देखने के लिए ज्यादा समय तक जीवित नहीं रहे। एक दिन दिल का दौरा पड़ने से वह इस दुनिया से चले गये। राजेश की माँ को उनके जाने का बड़ा दुख हुआ। लेकिन राजेश के लिए उन्होंने खुद को सम्भाला।
राजेश ने अपनी कमाई से एक बड़ा सा घर खरीदा। पुराना घर अब उसे काफी छोटा लगने लगा था। हालाँकि, राजेश की माँ इस घर को छोडकर बिल्कुल भी जाना नहीं चाहती थीं। क्योंकि इसी घर में उनका जीवन बीता था। ये घर उनके सुख दुख का साथी था। इस घर में राजेश के पिता की यादें थीं।
लेकिन राजेश की जिद के आगे उनकी एक न चली। आख़िरकार वह भी राजेश के साथ उनके नये घर में रहने आ गयी। लेकिन अपने पुराने घर की यादें वो कभी नहीं भूली। जब वो राजेश के साथ इस नए घर में आई तो इस बड़े से घर के वो बड़ा अकेला महसूस करती। राजेश को ऑफिस से घर आते आते काफी देर हो जाती। वो ऑफिस से थककर आता इसीलिए मां से ज्यादा बाते नहीं कर पाता। आसपास के पड़ोसी बातचीत करने में दिलचस्पी नहीं रखते थे और घर आई कामवाली के साथ मां ज्यादा बाते करे ये बात राजेश को अच्छी नहीं लगती।
कुछ दिनों बाद राजेश ने अपने ही ऑफिस में काम करने वाली राजश्री से शादी कर ली। घर में नई बहू आई। राजेश की मां को लगा कि बहू के आने से उनका अकेलापन कम हो जाएगा। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। राजश्री अपने ऑफिस के काम और फिर अपने दोस्तों और पार्टियों में ही व्यस्त रहती। जैसे ही दिन बीतते गए राजेश भी अपनी मां से ज्यादा कम बाते करने लगा था।
राजेश और उसकी पत्नी दोनों ही अपनी जिंदगी के मजे ले रहे थे। उन्हें अब माँ बोझ सी लगने लगी थी। वहीं अकेलेपन के कारण राजेश की मां की तबीयत भी खराब रहने लगी थी। और राजेश या उसकी बीवी अपनी व्यस्त जीवनशैली के बीच में मां का खयाल नहीं रख पा रहे थे। उन्होंने मां की देखरेख के लिए चौबीस घंटे के लिए एक नर्स का इंतजाम किया।
लेकिन राजेश की मां नर्स से आए दिन राजेश के साथ समय बिताने की मांग करती। वो नर्स से कहती के राजेश को फोन मिला दे। पर राजेश अपनी व्यस्तता के बीच मां के यू फोन करके बात करने से नाराज था। ऊपर से राजश्री ने भी मां की शिकायतें बताकर राजेश का गुस्सा और बढ़ा दिया।
एक दिन राजेश ने गुस्से में मां को बहुत सारी बातें सुनाई। उसने कहा के तुम मेरी तरक्की देख नहीं सकती हो मां। कम के समय में बार बार मुझे परेशान करती रहती हो। हम पति पत्नी को एकदूसरे के साथ भी समय चाहिए होता है। ऐसे में हम सिर्फ तुम्हारे आगे पीछे नहीं कर सकते है। हमें अपनी व्यक्तिगत जिंदगी पर भी ध्यान देना होता है वगैरह। उस दिन मां को अहसास हो गया के अब वो राजेश के लिए केवल एक बोझ है। उसके अलावा कुछ नहीं।
आख़िरकार राजेश ने मां को किसी अच्छे वृद्धाश्रम में रखने का फैसला किया। शुरू में तो मां ने वृद्धाश्रम जाने से मना कर दिया लेकिन राजेश ने उनकी बात न सुनते हुए उन्हें समझाया के उनके हमउम्र लोगों के साथ वो अच्छे से रह पाएगी।और किसी तरह समझा बुझाकर उन्हें वृद्धाश्रम में भेज ही दिया।पहले तो वो हर दो महीने में अपनी माँ से मिलने जाता।
लेकिन बाद में उनके पास अपनी मां से मिलने का समय नहीं मिल पाता। लेकिन वृद्धाश्रम में समय समय पर चैरिटी के पैसे वो भेजता रहता। न जाने कितने ही दिनों से उसने मां की कोई खबर नहीं ली थी। और उसके बाद वो माँ को आज यहाँ देख रहा था। अपने पुराने घर में। जिसे उसने कुछ दिन पहले मन्नू को बेचा। ये सब क्या चल रहा है वो समझ ही नहीं पा रहा था।
आगे बढ़कर अपनी माँ से मिलने की उसकी हिम्मत नहीं हुई। जैसे ही वह वापस जाने के लिए मुड़ने लगा, उसने मन्नू को सामने से आते देखा। मन्नू को भी राजेश को यहाँ देखकर आश्चर्य हुआ। राजेश ने मन्नू को देखते ही पूछा।
“मेरी माँ यहाँ क्या कर रही है…?”
“मैंने यह घर उनके लिए आपसे खरीदा है…?” मन्नू ने जवाब दिया।
“पर तुम मेरी माँ को कैसे जानते हो…?” राजेश ने आश्चर्य से पूछा.
“मैं आपके घर के पीछे वाली गली में ही रहता था…उन दोनों हमारी आर्थिक स्थिति बहुत ख़राब थी… मेरे पिता शराबी थे। शराब के नशे के कारण वो मेरी मां को खूब परेशान करते। कभी कभी मारपीट भी करते। कई बार मां को भूखे पेट सोने की नौबत आती। तब आपकी माँ ने मेरी माँ को सहारा दिया। जब वो भूखी होती तो अपने हाथ से खाना बनाकर मेरी मां को खिलाती।
जब मैं अपनी मां के पेट में था तो उन्होंने मेरी मां का बहोत खयाल रखा। बाद में जब ज्यादा शराब पीने से मेरे पिता की असमय मृत्यु हुई तो मेरी मां को मजबूरी में बाहर जाकर काम करना पड़ा। पर मैं बहुत छोटा था तो मां मुझे अकेला छोड़कर नहीं जा सकती थी। तो आपकी मां ने खुद आगे आकर मेरी जिम्मेदारी ली। मेरी मां मुझे उनके पास छोड़कर काम पे जाती। बाद में हम अपनी मामा के घर रहने चले गए। पर मेरी मां हमेशा उनको याद करती और मुझे बताती के उन्होंने मेरा अपने बेटे जैसा ही खयाल रखा था।
जब मैं 15 साल का हुआ तो एक बीमारी के कारण मेरी मां का निधन हो गया और मैं अनाथ हो गया। उसके बाद मैं अपने मामा के घर पर रहता। वह पे उन लोगों ने मुझे पाला पर किसी ने मुझे मां का प्यार नहीं दिया।मेरी मामी मुझसे घर का सारा काम करवाती पर मुझसे प्यार से कभी बात न करती। मेरे सामने अपने बच्चों को ताजा खाना खिलाती और मुझे बासी खाना मिलता। मैं मां के प्यार के लिए तरस गया था। फिर कुछ दिनों बाद मैं शहर आ गया। वह एक गैराज में काम किया। गैराज का मालिक बहुत अच्छा था। वहां मैंने काम सीखा और कुछ दिनों के बाद मैने अपना छोटा सा गैराज खोल लिया।
कुछ दिनों बाद मेरी शादी मीना से हो गई और हमारा बेटा भी हुआ। लेकिन मां की याद बार-बार आती रहती। मेरी पत्नी भी अनाथ थी। जब वह छोटी थी तो उसकी मां इस दुनिया से चली गई थी। एक दिन जब मैं एक दोस्त की कार की मरम्मत के लिए वृद्धाश्रम गया। अचानक मेरी नज़र आपकी माँ पर पड़ी। जब मैंने उनके बारे में पूछताछ की तो पता चला कि आप उनको वृद्धाश्रम छोड़कर गए थे। वो वहां पर उदास सी बैठी रहती। आपको याद करके रोती रहती।
मैंने सोचा कि मैं आजतक मां के प्यार के लिए तरस रहा हूं। और मां जी अपने बेटे के लिए तरस रही है। अगर ये मेरे साथ मेरे घर चले तो कितना अच्छा होगा। मैं जब अपने घर गया और अपनी पत्नी से इस बारे में बात की तो वो मेरी कल्पना से बहुत खुश हुई। फिर मैं अपनी पत्नी और बेटे को मां जी के पास ले गया और मां जी को अपना परिचय दिया। मां ने जल्दी ही मुझे पहचान लिया।
फिर मैने मां से अनुरोध किया के मै अनाथ हो गया हु। मेरे सर से प्यार से हाथ फेरने वाला इस दुनिया में कोई नहीं है। आप अगर मुझे अपना बेटा मान मेरे घर रहने चलेगी तो मुझे मां का और आपको बेटे का प्यार मिल जाएगा। शुरू में तो वो हिचकिचाई पर जब मेरी पत्नी मीना ने उनसे साथ चलने का अनुरोध किया तो वो मान गई। इस तरह से मीना और मुझे मां का प्यार मिल गया और मेरे बेटे को दादी का प्यार मिल गया।
मां जी के आने से मेरे घर में खुशियां ही खुशियां आ गईं। आगे मां की बातों से मुझे एहसास हुआ कि उन्हें इस पुराने घर की बहुत याद आती है। जब मैंने इस घर के बारे में पता किया तो पता चला कि आप यह घर बेचने जा रहे हैं। फिर क्या…मैंने हिम्मत की और घर खरीद लिया। जब फैसला किया तब मेरे पास इतने पैसे नहीं थे, लेकिन मुझे मां के लिए ये घर लेना था। और भगवान की दया से और मां के आशीर्वाद से गैरेज का कम अच्छे से चल पड़ा और मुझे घर खरीदने के लिए कही से कर्जा भी मिल गया। मैने मां जी के लिए ये घर खरीद लिया। मां जी को बहुत खुशी हुई। अब हम सब मां जी के साथ यही रहते है। मां के आने से हमारा परिवार पूरा हो गया।” मन्नू भावविभोर होकर बता रहा था।
वहीं राजेश जिसको अभी तक पता नहीं था के उसने क्या खोया है वो मन ही मन मन्नू को बेवकूफ समझ रहा था के जिस जिम्मेदारी से वो भागना चाहता था मन्नू ने खुद उसे बेवकूफों की तरह अपने सर पर ले लिया था।
अपनी माँ का साया खोने वाले मन्नू को माँ के प्यार की कद्र और एहसास दोनों था। लेकिन भगवान ने जिसकी झोली मां के प्यार से भर दी थी उस राजेश को मां के प्यार का तनिक भी अहसास न था। उम्मीद करते है कि कभी न कभी राजेश को अपनी गलती का अहसास जरूर होगा और तब उसके पास पछताने के अलावा कोई चारा नहीं होगा।
समाप्त।
©®आरती निलेश खरबडकर.

