वो मेरी बीवी है; नौकर नहीं।

वो मेरी बीवी है; नौकर नहीं।

दामिनी जी ने अपनी दोनों बेटों कबीर और विराज की शादी एक ही दिन और एक ही मंडप में करने का फैसला किया था। घर में मेहमानों का आगमन हो चुका था। दामिनी जी व्यक्तिगत रूप से सारी तैयारियों की देखरेख कर रही थी। हर एक चीज उनकी पसंद से घर में आई थी।

लेकिन उन्होंने जानबूझकर अपनी बड़ी बहू के लिए हल्की और छोटी बहु के मुकाबले सस्ती चीजे खरीदी थी। जबकि छोटी बहू के लिए सभी महंगी चीज़ें ली गई थीं। इसके पीछे की वजह यह थी के उनकी बड़ी बहु अवनी उनके बेटे कबीर की पसंद थी। पर दामिनी जी को वो कुछ खास पसंद नहीं आई थी। उन्होंने कबीर को समझाने की कोशिश की पर वो अपनी पसंद पर अड़ा रहा। और उनके पती कैलाश जी ने भी इस बात पर कबीर का साथ दिया। फिर दामिनी जी कुछ बोल ही नहीं पाई थी। पर अपनी नापसंदगी को वो इस तरह दोनों में फर्क करके दिखा रही थी।

उनकी छोटी बहु विधि को उन्होंने खुद अपने बेटे विराज के लिए पसंद किया था। विधि भी उन्हीं के बराबर के खानदान से थी। विधि एक अमीर घर की लड़की थी। और अवनी एक मध्यम वर्ग से ताल्लुक रखती थी। और इसीलिए इन्होंने गहनों, साड़ियों और बाकी चीजों में भी फर्क रखा था।

दामिनी जी ने अभी से दोनों बहुओं में फर्क करना शुरू कर दिया था। विधि अभी से उनकी पसंदीदा बहु बन चुकी थी और अवनी मजबूरी में ब्याह कर लाई बहू बन गई थी।

दोनों शादियां धूमधाम से हुई। अवनी के पिता ने भी अपनी तरफ से जो बन सका वो सब किया। शादी के दिन ही दामिनी जी के व्यवहार से अवनी को अहसास हो गया था के उसके किए दामिनी जी के दिल में जगह बनाना थोड़ा मुश्किल है। लेकिन उसने भी अपनी सासुमा का दिल जीतने की ठान ली। अवनी बहुत समझदार थी। जानती थी के सासुमा का दिल जीतना मुश्किल है। पर ये भी जानती थी के अच्छाई में बड़ी ताकत होती है।

अवनी घर के कामों में निपुण थी। स्वभाव भी बड़ा सरल था। इसके विपरित विधि अपनी अमीरी का घमंड करने वाली और कामों में आलसी थी। दामिनी जी ने दोनों बेटों की शादी के बाद घर की जिम्मेदारियों से किनारा कर लिया था। घर के काम की जिम्मेदारी बहुओं पे डालकर अब वो आराम की ज़िंदगी गुज़ार रही थी।

अवनी ने बड़े ही अच्छे से घर की जिम्मेदारियों को आते ही संभाल लिया था। लेकिन विधि ने अबतक अवनी की मदद करने की कोशिश भी नहीं की थी। वह बस अपने रूम में बैठी रहती और दिनभर फोन से चिपकी रहती। जब घर के सारे काम निपट जाते तब विधि अपने रूम से बाहर आती और अपनी सासुमा से मीठी मीठी बाते करती रहती।

दामिनी जी को भी पता था कि घर के सारे काम अकेले अवनी ही करती है। लेकिन उन्हें लगता था कि अवनी को घर के काम करने की आदत है। लेकिन विधि लाड़ प्यार में बड़ी होने के कारण उसे काम करने की आदत नहीं होगी ये सोचकर उन्होंने इस बात की तरफ बिल्कुल ध्यान ही नहीं दिया।, ना ही कभी विधि को उसकी ज़िम्मेदारियों की तरफ अवगत कराया। उल्टा वे घर में आए मेहमानों से विधि की तारीफ करते थकती नहीं। पर अवनी के बारे में उन्होंने कभी किसी से एक शब्द भी अच्छा नहीं कहा। दामिनी जी ने कभी भी अवनी की अच्छी बातों को सराहा नहीं। उल्टा अगर अवनी से कोई छोटी से गलती भी हो जाती तो वो विधि के सामने ही अवनी को डांट देती। और यही सब देख के अब विधि भी अपनी जेठानी का मान नहीं रखती। उल्टा अब तो वो भी अवनी के कामों में गलतियां निकालने लगी थी।

अवनी को लगता के किसी दिन सास को उसकी खूबियों का अहसास होगा और वो उसे दिल से अपना लेगी। पर अब वो भी ये बात समझ चुकी थी के दामिनी जी उस समझना चाहती ही नहीं है। घर में को ये सब चल रहा था इसके बारे में कबीर को कुछ भी पता नहीं था। वो सुबह ऑफिस जाता तो देर रात को घर लौटता। छुट्टी का दिन भी किसी ना किसी काम में ही चला जाता। और अवनी ने भी उसे कभी कुछ बताया नहीं। वो नहीं चाहती थी के घर में बेमतलब ही विवाद हो।

अब तो विधि भी अवनी को हल्के में लेने लगी थी। वो अपना छोटा मोटा काम भी अवनी से ही कराने लगी थी। वो सुबह देर से उठती और अपनी चाय अवनी से रूम में ही मंगवाती। अवनी भी बिना किसी शिकायत के उसके काम कर देती।

एक बार कबीर की तबीयत कुछ बिगड़ गई। इसीलिए उसने ऑफिस से कुछ दिन की छुट्टी। उसने सोचा के इसी बहाने अपनी अवनी के साथ कुछ ज्यादा समय बिता पाएगा।

लेकिन एक बार मल्हार की तबियत बिगड़ गई, इसलिए उसने कुछ दिनों की छुट्टी ली और घर पर रुका। उसने सोचा कि इस बहाने मानसी के साथ अधिक समय बिता सकता है। लेकिन उसने देखा के अवनी दिनभर सिर्फ घर के काम में ही लगी रही। कबीर ने देखा कि घर में केवल अवनी ही अकेली काम कर रही थी। विधि को चाय भी उसके कमरे में दे आती और अकेली रसोई और घर की बाकी जिम्मेदारियां संभालती। घर में कोई मेहमान आता तो विधि उनके साथ बैठकर बाते करती और अवनी मेहमानों के लिए चाय नाश्ता बनाती रसोई मै ही रहती।

एक दिन कबीर और दामिनी जी सुबह हॉल में बैठे कुछ बाते कर रहे थे। अवनी रसोई मै खाने की तैयारी कर रही थी। अचानक विधि हॉल में आई और सोफे पर बैठकर रसोई मै अवनी को आवाज लगाते हुए बोली।

” भाभी, ज़रा एक ग्लास नींबू पानी लाना।

” हा, अभी लाती हू।” अवनी ने कहा।

” अवनी थोड़ी काम में बिज़ी है। तुम खुद ही रसोई मै जाकर निंबुपानी क्यों नहीं बना लेती।” कबीर ने विधि से कहा।

” क्यों ? छोटी बहु को एक ग्लास नींबू पानी दे देगी तो क्या तुम्हारी बीवी के हाथ टूट जाएंगे ??” दामिनी जी ने कहा।

” लेकिन माँ, पिछले दो-तीन दिनों से मैं देख रहा हूँ की उसे सुबह से बहुत काम होते है। और सभी के चाय से लेकर खाने तक सब अवनी ही करती है।… तो फिर विधि को कम से कम अपने लिए नींबू पानी तो खुद से बना लेना चाहिए।” कबीर ने कहा।

” लेकिन विधि को घर के काम करने की आदत नहीं है… उसके घर में ऐसे कामों के लिए नौकर होते थे। लेकिन अवनी को सभी काम करने की आदत है। उसने कहा नौकर चाकर देखे होंगे उसके घर में।” दामिनी जी ने कहा।

” तुम ये क्या कह रही हो मां। तुम अवनी के बारे में ऐसा सोचती हो। अवनी विधि जीतने अमीर घर से नहीं आई है उसका मतलब ये नहीं के आप उसे ऐसी हीनता वाला व्यवहार करे। अवनी मेरी पत्नी है। उस घर की बड़ी बहू। इसीलिए विधि का उसे इस तरह काम के लिए आदेश देना सही नहीं है।” कबीर ने मां को समझाया।

” पर इन सब बातो से कोई फर्क नहीं पड़ता। अवनी को आदत है घर के काम करने की। वो अबतक करती आ रहीं है तो आगे भी कर लेगी।” दामिनी जी ने बड़ी ही बेफिक्री से कहा।

” नहीं माँ, घर के सारे काम सभी को मिलकर करने चाहिए। कम से कम अपना काम तो खुद करना चाहिए ही। क्योंकि मेरी पत्नी एक मिडिल क्लास परिवार से आई है इसका मतलब ये नहीं के आप उसे नौकरों की तरह बर्ताव करे। उसे कोई भी कभी भी अपने काम के लिए आदेश दे। आपकी पत्नी के साथ ये व्यवहार मै बर्दाश्त नहीं करूंगा मां।” कबीर ने दो टूक जवाब दिया।

” इस घर में रहना है तो उसे घर के सारे काम तो करने ही पड़ेंगे… नहीं तो तुम तुम्हारी पत्नी को लेकर अलग रहने चले जाओ।” दामिनी जी ने गुस्से में कहा।

दामिनी जी को लगा कि उनके ऐसा कहने से कबीर चुप हो जाएगा और इस बारे में आगे कोई बात नहीं करेगा। लेकिन माँ की बातें कबीर के दिल को किसी तीर की तरह चुभ गईं। उसने अलग रहने का फैसला लिया। अवनी ने उसे समझाने की कोशिश की, उसे रोकने की कोशिश की। लेकिन उसने अवनी की एक भी बात नहीं सुनी। और जल्द ही किराए पर एक फ्लैट लेकर अवनी के साथ वहां शिफ्ट हो गया।

अवनी और कबीर अब अलग घर में रह रहे थे। इधर घर में केवल दामिनी जी और विधि और विराज रह रहे थे। अगले दिन सुबह दामिनी जी सुबह उठी तो अपनी चाय का इंतेज़ार करने लगी। जब चाई नहीं मिली तो उठकर किचन में चली गई। किचन में तो सन्नाटा था। रात का किचन वैसे का वैसा ही बिखरा पडा था। तो वो विधि के कमरे में गई और उसे कहा।

” छोटी बहू, जरा उठके मेरे और विराज के लिए चाय और नाश्ता बना देना।

” मम्मीजी, मुझे अच्छी चाय बनाना नहीं आता। और नाश्ता तो मैंने कभी बनाया नहीं इससे पहले। आप ही बना दीजिए ना चाय और नाश्ता। तबतक मै तैयार होकर आती हूं।” विधि ने कहा।

विधि की बात सी सुनकर दामिनी जी को गुस्सा आया। पर फिर वो उसे कुछ नहीं कह पाई। वो किचन में आती और अपने साथ साथ उन्होंने विधि और विराज के लिए भी चाय नाश्ता बना दिया। जबतक अवनी घर में थी तब तक उन्होंने किचन में कोई भी काम नहीं किया था। उन्हें अवनी के हाथो के चाय की आदत भी हो चुकी थी।

चाय और नाश्ते के बाद खाना भी दामिनी जी को खुद ही बनाना पड़ा। अब किचन की जिम्मेदारी पूरी तरह से दामिनी जी पे आ गई थी। विधि उनकी थोड़ी बहुत मदद करती पर मदद से ज्यादा काम बढ़ा ही देती।

उसके बाद नाश्ता और खाने में भी कल्याणी ने वही किया। अब गिरिजा आंटी को खुद किचन संभालना पड़ रहा था। कल्याणी थोड़ा बहुत मदद करती, लेकिन उतना ही चिड़चिड़ापन भी करती। उसका भद्रता का मुखौटा धीरे-धीरे उतरने लगा था। और उसकी मीठी बातों की जगह अब तानो ने ले ली थी। उसे कोई भी काम बताओ तो वो अपने मायके की दुहाई देकर कहती के हमारे घर में तो नौकर चाकर है इन कामों के लिए। दामिनी जी से अब घर संभाला नहीं जा रहा था तो उन्होंने अपनी हेल्प के लिए एक हाउस हेल्प को रख लिया।

पर इन सबके बाद दामिनी जी को अवनी की अहमियत का अहसास हो गया था। अवनी और विधि में क्या अंतर है ये भी समझ में आ गया। अवनी एक समझदार, गुनी एवम् बड़ों का आदर करने वाली लड़की है ये वो जान गई थी। इंसान की कदर उसकी संपत्ति से ज्यादा उनके गुणों से करनी चाहिए ये बात वो समझ गई थी। अवनी को कादर न करना उनकी बहुत बड़ी ग़लती थी और अब वो अपनी ग़लती को सुधारना भी चाहती थी।

वो अवनी से मिली और उससे अपने व्यवहार के लिए माफी भी मांगी। और उस और कबीर को फिर से घर वापिस चलने को भी कहा। दामिनी जी को सच मे पछतावा हुआ है ये जानकर अवनी और कबीर फिर से वापस घर लौट आए। उसके बाद दामिनी जी ने अवनी और विधि में कोई फर्क नहीं किया।

समाप्त।

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *