
अंजलि किचन में खाना बनाने की तैयारी में लगी थी। इतने ने अचानक ही उसकी सासू मां आई और अपने खाने की तैयारी खुद ही करने लगी। उनके चेहरे पे गुस्सा साफ साफ दिखाई दे रहा था। और किचेन में खाना बनाने की आदत कई सालों से छूट गई थी। इसी कारण उनसे सफाई से काम भी नहीं हो रहा था। इस वजह से सासू मां और भी चिढ़ गई थी। हाथ में जो भी बर्तन आता उसको पटकती जा रही थी। अंजलि एक कोने में खड़ी होकर देखने लगी। फिर हिम्मत करके सासू मां को कहा।
” मां जी…खाने की तैयारी लगभग हो गई है। मैं बस अभी सब्जी बनाने ही जा रही थी।”
अंजलि की बाते सुनकर सासू मां ने गुस्से में उसकी ओर देखा और कहा।
” तुम्हे हमारे लिए कुछ भी करने की कोई जरूरत नहीं है। अभी तक हमारे साथ जो भी किया है वो कम है क्या ?…मेरे बेटे को तो खा गई। और चली है हमें खाना खिलाने।”
” आप ऐसा क्यों कह रही है मां जी। मुझसे कोई गलती हुई है क्या ?” अंजलि ने सहम कर कहा।
” तुम कहा कोई गलती कर सकती हो..? गलती तो हमसे हुई है। इसीलिए तो तुम जैसी मनहूस लड़की को ब्याहकर घर लाए है।” सासू मां ने फिर गुस्से से कहा।
सासू मां की बात सुनकर अंजलि की आंखों में आंसू आ गए। वो किचन से निकलकर अपने रूम में आई और अपना चेहरा तकिए में छुपाकर रोने लगी। ताकि उसकी छोटीसी गुड़िया सिया उसका रोना देख ना ले।
अंजलि एक सत्ताईस साल की विधवा थी। उसके पति मुकेश की दो महीने पहले दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई थी। पति के बाद उसके सास ससुर ने उसे और उसकी पांच साल की बेटी सिया को संभाला था। मुकेश के बाद उसे सास ससुर ने अकेला महसूस नहीं होने दिया था। पर आज अचानक सासू मां की कड़वी बातों ने उसके दिल को छलनी कर दिया था। उसे समझ नहीं आ रहा था के अचानक सासूमां को ये क्या हो गया है। उससे ऐसी क्या गलती हो गई जो सासूमां उससे ऐसा व्यवहार कर रही है।
अंजलि की सास ने उससे इतना रुख व्यवहार कभी नहीं किया था। जब वो बहु बनकर इस घर में आई थी तब भी उन्होंने बड़े प्यार से उसे संभाला था। और जब मुकेश इस दुनिया से चला गया तो अपने गहरे दुख को अपने अंदर रखकर वो अंजलि और सिया के लिए फिर से मजबूती से खड़ी हो गई थी।
लेकिन पिछले कुछ दिनों से अंजली की जेठानी उल्का घर आती और अपनी सास के मन में अंजली के बारे में कुछ न कुछ गलत सलत भरती रहती। दुःख में उन्हें सांत्वना देते हुए वह अंजली के बारे में कुछ-न-कुछ बुरा भला कहती रहती। पहले से दु:ख मे डुबी होने के कारण सासू मां धीरे-धीरे उल्का की बातों में आने लगी थी।
सासू मां अपने बेटे मुकेश के चले जाने पर दूसरे बेटे आशीष से सहारे की आस में आशीष के परिवार को अपना मान कर अंजली से एक बाहरी व्यक्ति की तरह व्यवहार कर रही थी। उल्का सासू मां से कहती कि अंजली के भाग्य में पति का सुख नहीं होगा, इसलिए देवरजी इतनी जल्दी दुनिया से चले गए। सासू मां को ये भी लगता के मुकेश के जाने के बाद अब बुढ़ापे में आशीष और उल्का का ही सहारा बचा है।
अंजली और मुकेश की शादी के तीन महीने बाद ही उल्का अपने पति के साथ अलग घर में रहने लगी थी। यह नया घर भी आशीष के पिता का ही था। लेकिन उल्का अब सास-ससुर की जिम्मेदारी लेना नहीं चाहती थीं।
सास ससुर के साथ रहते हुए भी कभी उनकी अपनेपन से सेवा नहीं की। वो हमेशा से ही अपनी अलग गृहस्थी बसना चाहती थी। वो भी सास ससुर के बिना। लेकिन क्योंकि पहले वो घर की एकलौती बहु थी तो अपने मन की कर नहीं पाई थी। लेकिन जब अंजली और मुकेश की शादी हुई तब उल्का ने अपने अलग रहने की इच्छा सभी के सामने जाहिर की। सासू मां को पता था के उल्का का अब बिल्कुल भी मन नहीं है साथ रहने का। और उसे जबरदस्ती साथ रहने को कहा जाए तो घर में झगड़े होना तय है। इसीलिए उसकी सासू मां ने भी उसे अलग होने से रोका नहीं।
लेकिन छोटी बहु अंजली ने अपनी सास ससुर का बहुत अच्छे से ख्याल रखा। उनका माता-पिता की तरह ही सम्मान किया। और जल्द ही उसने सबका दिल जीत लिया। तभी से दोनों सास बहु मां बेटी की तरह रहती। सब कुछ अच्छा चल रहा था लेकिन अचानक मुकेश इस दुनिया को छोड़ कर चला गया।
शुरू में अंजली और उसकी सास ने एक दूसरे को संभाला। फिर उन्होंने घर के बाकी लोगों को भी संभाला। आशीष और उल्का भी पूरा महीना सबके साथ इसी घर में थे।
लेकिन मुकेश के जाने के बाद से उल्का के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था। उसे लगा के मुकेश के जाने के बाद ससुर की पेंशन, उनका घर, ये सब अंजली और सिया को ही मिलेगा।
इसलिए, अगर अंजली की सास उसे और सिया को इस घर से खाली हाथ उसके मायके भेज देती है, तो इस पूरी प्रॉपर्टी पर सिर्फ उस का और उसके बच्चों का अधिकार रहेगा ये सोचकर वो अपनी सास को अपने पक्ष में और अंजली के खिलाफ करने की कोशिश कर रही थी और धीरे-धीरे उसका यह मकसद पूरा भी हो रहा था। अंजली की सास अब उससे जब भी बात करती तो एक ही बात कहती थी कि राकेश की मौत की जिम्मेदार तुम ही हो।
एक दिन उल्का सुबह-सुबह किसी काम से अपनी ससुराल आ गई। उस दिन हमेशा की तरह सास रसोई में खाना बनाने की कोशिश कर रही थी। उल्का ने उन्हें देखकर कहा।
” मां जी आपके कितने बुरे दिन आ गए है। घर में बहू होकर भी आपको खाना बनाना पड़ता है। ये सब मुझसे देखा भी नहीं जाता।”
पहले से ही परेशान सास को अब बोलने की वजह मिल गई। उन्होंने कहा।
“हाँ बहु। बुरे दिन ही आ गए हैं मेरे। इसिलिए तो न चाहते हुए भी मुझे बार-बार इसका चेहरा देखना पड़ता है। भगवान जाने किस बुरे कर्म की सजा मिल रही है।”
” अगर आपको इसका चेहरा नहीं देखना है तो आप देख ही क्यों रही है माँजी। आप उसके साथ एक ही घर में क्यों रह रहे हो।” उल्का बोली।
“तुम सही कह रही हो बहु। जब मेरा एक बड़ा बेटा है, तो मुझे इसके साथ रहने की क्या ही जरूरत है। हम दोनों आज अपना सामान लेकर तुम लोगों के साथ रहने आते है।” सासू मां बोली।
यह सुनकर उल्का चौंक गईं। उसने सोचा था कि सासुमाँ अंजली को इस घर से बाहर निकाल देगी। लेकिन सासू माँ ने तो उसके इरादों पर मानो पानी ही फेर दिया था। सास ये घर अंजली के लिए छोड़कर खुद उल्का के साथ जाने की बात कर रही थी। मतलब ये घर तो उल्का को मिलेगा नहीं उल्टा उसे सास ससुर की जिम्मेदारी भी लेनी पड़ेगी। उल्का बिल्कुल भी सास ससुर की जिम्मेदारी उठाने नहीं चाहती थी। उसने अपनी एक अलग दुनिया बना ली थी। और अभी उसे अपने ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं चाहिए थी।
” मां जी। आप ये क्या कह रही है। आप ये घर अंजली को दे देगी। आपको तो उसे ही इस घर से बाहर निकलना चाहिए।”
” जब बेटा ही नहीं रहा तो उसके घर में रहकर हम क्या करेंगे। हमें अब इस घर में नहीं रहना। मुझे तो अब अपने आशीष के पास जाकर रहना है। अब वहीं हमारे बदले का सहारा है। और मैं इसको इस घर से कैसे निकाल सकती हु। तुम्हारे ससुर जी ये घर उसके और मुकेश के नाम पर पहले ही करवा चुके थे। तो अब ये घर इसी का है और मुझे इसके साथ नहीं रहना अब।” सासू मां ने कहा।
उल्का को इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि घर अंजली और मुकेश के नाम पे हो चुका था। और जब उसे पता चला तो वो जोर से बोली।
” ये मकान तो पापाजी के नाम पर था ना। तो ये देवरजी और अंजली के नाम पर कब करवाया अपने ?”
” एक साल हो गया बहू। तुम्हारे लालाजी बोले के एक मकान आशीष और तुम्हारे नाम पे करवाया है तो ये मकान मुकेश और अंजली के नाम पर कर दिया। अब ये सब बाते कर के क्या फायदा ? छोड़ो इन बातों को। कई तुम्हारे पापाजी को बताकर आती हु हमे आशीष के घर रहने जाना है।” सासू मां ने कहा।
उल्का को इस बात का अंदाजा नहीं था कि घर मुकेश और अंजली के नाम पर हो चुका होगा। ये जानकर उल्का हैरान और परेशान रह गईं। अब उसे ऐसा लगा जैसे उसने अपने ही पैर कुल्हाडी मार ली हो। उसे बहुत गुस्सा आया और गुस्से में वो बोली।
” वाह सासु मां। आपकी प्रॉपर्टी इस अंजली को मिलेगी। और मुझे क्या मिलेगा ? तो आप लोगों की जिम्मेदारी। मैं नौकरों की तरह आपकी सेवा करूंगी और ये अंजली मजे से इस घर में रहेगी। क्या आपने मुझे इतना मूर्ख समझा है।”
उल्का की बदतमीजी भरी बात सुनकर सासूमां आश्चर्य से बोली।
” ये तुम कैसी बाते कर रही हो बहु। अब तुम अहर आशीष ही हमारे सबकुछ हो। तुम ही ऐसा कहोगी तो हम किसके भरोसे जीयेंगे। और तुम ही तो न जाने कबसे मुझे कह रही थी के अब तुम दोनों ही हमारा सहारा बनोगी।”
” कई इतनी मूर्ख नहीं के बिना किसी फायदे के आपको अपने साथ ले जाऊं। बड़ी मुश्किल से मैने इस जिम्मेदारी से छुटकारा पाया है। अगर ये घर हमे मिलता तो शायद कुछ सोचती भी। और रही बात आपका सहारा बनने की तो जिस अंजली ने आपको अपनी मां का दर्जा दिया, आपकी सेवा की, आपको इज्जत दी आप उसकी ही सगी नहीं हो पाई तो मेरी क्या होगी।” उल्का ने गुस्से में कहा।
उल्का की बातें सुनकर अंजलि की सास चौंक गईं। अब उन्हें उसकी मीठी बातों की वजह समझ आई थी। उनके चेहरे पर पछतावे की शिकन साफ साफ दिखाई दे रही थी। पिछले कुछ दिनों में उन्होंने अंजली के साथ जो व्यवहार किया वो याद करके वो अंजली से नजर नहीं मिल पा रही थी। वो बदहवास सी जमीन पर बैठ गई। अंजली ने जब उनकी हालत को देखा तो वो बहुत दुखी हुई।
इधर उल्का बदतमीजी के साथ उसकी सास से बाते करती ही जा रही थी। अब तक बड़ी जेठानी के रिश्ते का लिहाज करती हुई अंजली उनकी सारी बातें सुन रही थी। पर अपनी सास के साथ ऐसा बर्ताव करते देख उससे रहा नहीं गया। उसने उल्का से कहा।
” बस कर दीजिए दीदी। माँ जी आपकी बातों से परेशान हो रही हैं। उनसे ऐसे बात मत कीजिए।”
अंजली की बात सुनकर उल्का ने कहा।
” पिछले दिनों तुम्हारा कितना अपमान किया इन्होंने, तुम्हे भला बुरा कहा, जिसका पती मर गया है उसे सहारा देने की जगह परेशान किया, और तुम फिर भी उनका पक्ष ले रही हो और मुझ से जुबान लडा रही हो ?”
“वो चाहे जो भी कहे। वो मेरी मां के समान हैं और उनसे कोई इस तरह बदतमीजी से बात करे ये मै बर्दाश्त नहीं कर सकती।” अंजली ने कहा।
” तुम भी अव्वल दर्जे की मूर्ख हो अंजली।” ऐसा बोल कर उल्का गुस्से में चली गई। अंजली ने सास की ओर देखा| उनके आँखों से आँसू बह रहे थे। उसने अपनी सास को कहा।
” मांजी…आप दीदी की बातों का बुरा मत मानिए।”
” मुझे उसकी बातों का बुरा नहीं लग रहा बहू… मुझे अपने आप पर तरस आ रहा है। ये मै अपने साथ क्या करने जा रही थी। अगर उल्का का असली रूप जल्दी सामने नहीं आता तो मैं तुम जैसी हीरे जैसी बहु को खो देती। उल्का की बातों में आकर मैने तुम्हे न जाने क्या क्या नहीं कहा। कितने ही इल्जाम लगाए तुमपर। अशुभ, अपशकुनी, पति को खा गई, और न जाने क्या क्या। और तो और इतने दिनों से सिया को भी प्यार से गले नहीं लगाया। जब तुम्हे मेरी सबसे ज्यादा जरूरत थी तब मैने तुम्हे अकेला छोड़ दिया। मै तो तुमसे नजरे मिलने के लायक भी नहीं।” सासूमां ने आत्मग्लानि में कहा।
” नहीं माँजी। मैं समझ सकती हूँ। आप इनके जाने से बहुत दुखी हैं। और दीदी ने आपकी इस स्थिती का फ़ायदा उठाया और आप के दिमाग़ में ऐसे गलत विचार भरे। सच कहूँ तो मुझे आपकी बातों से इतना बुरा नहीं लगा जितना की आपसे दूर होने पे लगा। मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं माँजी।” अंजली मांजी के आंसु पोछ्कर बोली।
और फिर सासूमां ने अंजली को गले लगा लिया। उन्हें रोते देख अंजली भी अपने आप को रोक नहीं पायी। दोनों एक दुसरे से लिपटकर खुब रोई। और इन आंसूओ ने उनके रिश्ते में आइ कड़वाहट को बहा दिया।
समाप्त।
©®आरती निलेश खरबडकर।
