वैदेही ने अपनी बारहवीं तक की पढ़ाई जैसे-तैसे पूरी कर ली। और उसके घर में उसकी शादी की बातें होने लगीं। वैदेही आठवीं में थी तभी उसकी माँ इस दुनिया को छोड़कर चली गईं। तब से पूरे घर की ज़िम्मेदारी उसकी नाजूक कंधों पर आ गई थी।
उसके घर में उसके अलावा उसका बड़ा भाई सागर, और उसके पिता ही थे। वैदेही पढ़ाई में काफी होशियार थी। वैदेही घर की ज़िम्मेदारियाँ उठाते हुए पढ़ाई भी कर रही थी।
वैदेही सुबह जल्दी उठकर घर में झाड़ू लगाती। इसके बाद सभी के लिए चाय, नाश्ता, और खाने की तैयारी करती। खाना बनने पर कपड़े धोने और बर्तन साफ करने का काम करके वो स्कूल जाती। कई बार उसे अपनी माँ की बहुत याद आती। और फिर वह कई बार अकेले ही रोती रहती।
घर के काम करने के बावजूद वैदेही ने दसवीं की परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त किए थे। वैदेही के पिता चाहते थे कि वैदेही की ज़िम्मेदारियाँ कम हों और वह अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे। इसलिए उन्होंने अपने बड़े बेटे की शादी करने की सोची। उन्हें लगा कि घर में बहु आएगी ती वैदेही की जिम्मेदारियां कुछ कम हो जाएगी। साथ वैदेही को भाभी के रूप में एक दोस्त भी मिल जाएगी।
इसलिए उन्होंने वैदेही के बड़े भाई सागर की शादी के लिए लड़की देखने शुरू किया। उनके किसी रिश्तेदार ने उन्हें सविता का रिश्ता सुझाया। सविता एक गरीब परिवार की लड़की थी। दिखने में सुंदर और बारहवीं तक पढ़ी-लिखी थी। उन्हें लगा कि सविता सागर के लिए सही रहेगी। सागर को भी सविता पसंद आई और दोनों की शादी हो गई।
अपनी भाभी के घर आने से वैदेही बहुत खुश थी। उसे लगा कि भाभी के रूप में उसे एक दोस्त मिल गई है। लेकिन सविता के अपने अलग ही इरादे थे। सविता को लगा था कि घर में सास नहीं होने के कारण अब पूरे घर पर उसी का राज होगा।
वैदेही सविता के साथ बहोत अच्छे से पेश आती। उसके साथ बाते करती रहती। लेकिन सविता वैदेही के साथ कभी खुलकर बाते नहीं करती। वो वैदेही से मीठा बोलकर घर के साथ साथ अपने काम भी करवाती। घर में सागर कोई खाने पीने की चीज लाता तो सविता उसे वैदेही से छुपाकर रखती। फिर वैदेही के कॉलेज जाने के बाद अकेले खाती।
घर के काम करने के कारण वैदेही ठीक से पढ़ाई नहीं कर पा रही थी। उसका ज्यादा से ज्यादा वक्त घर के काम करने में ही निकाल जाता। सविता ने धीरे धीरे घर में अपना हुकुम चलाना शुरू कर दिया था। इन सब बातो से अनजान वैदेही के पिता खुश थे कि वैदेही को सविता के रूप में एक अच्छी साथी मिल गई है।
घरों के काम करते-करते वैदेही की पढ़ाई में कमी आ गई थी। सविता धीरे-धीरे घर का सारा काम अपने हाथ में लेने लगी थी। और वैदेही को मीठा बोलकर मेहनत करवाने लगी। वैदेही के पिता को अपनी बेटी के लिए बहू के रूप में एक अच्छी साथी मिल गई, इसका आनंद हो रहा था।
दसवीं में अच्छे अंकों से पास होनेवाली वैदेही बारहवीं में एक विषय मै फेल होते होते बची थीं। सविता अब चाह रही थी के वैदेही की शादी होकर वो अपने घर चली जाए और इस घरपर सिर्फ उसका राज रहे। इसीलिए उसने अब धीरे धीरे रिश्तेदारों में वैदेही के शादी के बारे में बात करना शुरू कर दिया था। वही वैदेही के पिता नहीं चाहते थे कि वैदेही की शादी इतनी जल्दी हो। पर सविता ने उन्हें कहा के अभी से लड़का देखना शुरू करेंगे तो भी 2-3 साल तो लग हो जाएंगे शादी होने मै। वैदेही के पिता को बहू सविता की ये बात ठीक लगी और फिर वो भी वैदेही के लिए लड़का ढूंढने लगे।
वैदेही के लिए रिश्ते तलाशे ही जा रहे थे के सविता ने सबको खुशखबरी दी के वो मां बनने वाली है। ये सबके घर में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। सभी बहोत खुश थे। वैदेही तो खबर सुनकर चहक उठी थी। इधर वैदेही के लिए भी एक बहुत अच्छा रिश्ता आया था। लड़के की अच्छी नौकरी थी। बड़े शहर में घर था। उनको वैदेही की फोटो पसंद आई। शादी बस तय ही होने वाली थी पर सविता के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था।
उसे लगा के वैदेही की शादी हो जाएगी तो उसकी गर्भावस्था मै और डिलिवरी के बाद उसे वैदेही की मदद नहीं मिल पाएगी। साथ ही उसे जलन भी हो रही थी के वैदेही के लिए इतना अच्छा रिश्ता आया है। इसीलिए उसने घरवालों को मनाया के अभी तो पहला हो रिश्ता आया है। हमे जल्दी नहीं करनी चाहिए। और इस तरह वैदेही की शादी कुछ वक्त के लिए टाल दी गई।
वैदेही ने गर्भावस्था में अपनी भाभी का बहुत ख्याल रखा। सभी ने उसे सर आंखो पर बिठाकर रखा था। सविता को किसी भी काम को हाथ तक नहीं लगाने दिया। सविता जो भी कहती वैदेही तुरंत कर देती। कुछ दिनों बाद सविता ने एक प्यारे बेटे को जन्म दिया। घर में सब लोग बहुत खुश थे।
वैदेही तो मानो जैसे सातवें आसमान पर थी। वो घर के साथ साथ बच्चे के सारे काम खुशी ख़ुशी करती। सुबह से लेकर रात तक कामों में ही रहती। बच्चे के साथ खेलते हुए वैदेही भी मानो बच्ची ही बन जाती।
अब सविता का बेटा दो साल का हो गया था। अब सविता को फिर से वैदेही की शादी कराने का ख़्याल आया। फिर से वैदेही के लिए रिश्ते देखे जाने लगे। फिर किसीने वैदेही के लिए राघव का रिश्ता सुझाया।
राघव ने हाल ही में पोस्ट ग्रैजुएशन पूरा किया था। वह प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हुए अपने परिवार के साथ खेत के काम में भी मदद करता था। राघव के दो बड़े भाई भी थे। माता पिता, दो भाभियां और उनके बच्चे ऐसा भरा पूरा परिवार था राघव का। राघव के घर में बहुत सारी खेती थी।
सविता के ससुराल अबतक सविता ने काफी धाक जमा ली थी। घर के छोटे मोटे फैसले अब उसकी मर्जी या सलाह से ही लिए जाते। इसिली वैदेही की शादी के बारे में भी सविता की राय सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होने वाली थी। सविता को लगा कि यह रिश्ता वैदेही के लिए सही रहेगा। क्योंकि संयुक्त परिवार होने से वैदेही को बहुत सारे काम करने होंगे और वैदेही घर की सबसे छोटी बहु होने के कारण उसकी दो जेठानियां भी उसपे अपना हुक्म चलाएगी।
सविता ने घरवालों को इस रिश्ते के बारे में सोचने के लिए कहा। राघव पास के ही गांव में रहता। इसीलिए वैदेही का भी आना जाना लगा रहेगा। साथ ही हम लोग भी उससे मिलने जाते रहेंगे। और भारा पूरा परिवार होने के कारण वैदेही को अकेलापन भी महसूस नहीं होगा। ये सब सविता ने सागर और अपने ससुरजी से कहा तो उनको भी ये रिश्ता वैदेही के लिए ठीक लगा।
वैदेही के पिता जब परिवार वालो से मिले तो उन्हें भी वह परिवार अच्छा लगा। गाँव में रहकर भी उनके विचार आधुनिक थे। उन्हें दहेज वगैरह भी नहीं चाहिए था। लड़का भी अच्छा लगा। राघव के परिवार को भी वैदेही बहुत पसंद आई। दोनों पक्षों की सहमति हुई और राघव और वैदेही की धूमधाम से शादी हो गई।
सविता बहुत खुश थी। उसे लगा कि अब वैदेही को और अधिक काम करना पड़ेगा। खेतों में जाना पड़ेगा। जेठानियों का हुक्म मानना पड़ेगा। लेकिन सविता के चाहने से वैदेही की किस्मत का लिखा थोड़ी ही बदलने वाला था। वैदेही की दोनों जेठानियां आपस में बहुत प्यार से रहती। कब वैदेही शादी करके उस घर में गई तो दोनों जेठानियों ने उसका अपनी छोटी बहन जैसा खयाल रखा।
काम करने की आदत तो वैदेही को पहले से थी। लेकिन यहाँ घर की तीनो बहु मिलकर काम करती तो हंसते-खेलते काम पूरा होता था। राघव भी वैदेही से बहुत प्यार करता। उसकी इज्जत करता। इतना सारा प्रेम मिलने से वैदेही बहुत खुश थी।
और इसी बीच सबको एक अच्छी खबर मिली। राघव ने शादी से पहले एक प्रतियोगी परीक्षा दी थी। उसका रिज़ल्ट अच्छा आया और राघव का सरकारी नौकरी में एक अच्छे पद पर चयन हो गया।
अब वैदेही के जीवन में खुशियों की लहर दौड़ पड़ी थी। राघव जल्द ही वैदेही को अपनी साथ शहर ले गया। वैदेही का में ही नहीं कर रहा था के वो अपने सास ससुर और जेठानियों से दूर जाए। बच्चों के बिना भी अब उसका मन नहीं लगने वाला था। पर राघव ने उसे समझाया के जब जब उसे घर की याद आएगी तब-तब हम घर आते रहेंगे। और राघव और वैदेही हर बार छुट्टी में घर आकर सबके साथ समय बिताते।
वैदेही अपनी ज़िन्दगी में खुश थी। लेकिन सविता वैदेही को खुश देखकर दुखी हो रही थी। उसे लगा था कि संयुक्त परिवार में वैदेही को अपनी जगह बनाने में कठिनाई होगी। लेकिन वैदेही की तो किस्मत ही मानो चमक गई थी। सविता मन-ही-मन वैदेही से जल रही थी। लेकिन इन सबसे अनजान वैदेही मन ही मन अपनी भाभी की अहसानमंद थी क्योंकि उन्होंने है राघव का रिश्ता उसके लिए चुना था।
वैदेही ने सच्चे मन से सविता को अपनी भाभी माना था। उसकी हर बात को मानती आती थी। पर इतनी अच्छी ननद मिलने के बाद भी सविता उसे कभी समझ ही नहीं पाई। उसने वैदेही के लिए बुरा ही सोचा। पर वो ये भूल गई थी के किसी के किस्मत में लिखा हुआ हम बदल नहीं सकते। आज सविता जलन के मारे अपने जीवन का अच्छे से आनंद नहीं ले पा रही थी। उसी जगह अगर उसने भी वैदेही को अपनी छोटी बहन मानकर उससे अच्छा व्यवहार किया होता तो वो भी निर्मल मन से अपने जीवन का आनंद ले पाती।
समाप्त।
©®आरती खरब़डकर.

