सिया का जब जन्म हुआ तब उसकी प्यारी सी हसी से पूरा घर खिल उठा था। घर में लक्ष्मीजी आई है ये मानकर सब उसे बहुत प्यार करते थे। सिया दो साल की हुई ही थी कि उसके जीवन में एक छोटा भाई आया… संकेत।
संकेत के जन्म के बाद सिया की माँ माया पूरा समय उसी के साथ रहने लगी। छोटा बच्चा, उसका रोना, उसे संभालना… सब ठीक था, लेकिन इसी बीच कहीं न कहीं सिया अनदेखी होने लगी थी। उसके खाने का समय, सोने का समय—सब कुछ बिगड़ गया था।पहले सिया को माँ की गोद में सोने को मिलता था। अब वह माँ के पास जाती तो माया कहती—
“सिया, दूर जाकर खेल… संकेत सो रहा है। तेरी आवाज़ से उठ जाएगा।”
सिया चुपचाप एक तरफ खड़ी रह जाती। उसे समझ नहीं आता था कि माँ अचानक इतनी दूर क्यों हो गई है।इसी समय सिया की बुआ रागिनी ससुराल में अपनी उपेक्षा सहन न कर पाने के कारण मायके आ गई। उसके ससुराल में उसे हर समय सांस के ताने और पति का गुस्सा सहन करना पड़ता।
रागिनी के भाई यानी सिया के पिता ने उसकी शादी करते समय लड़के के बारे में ठीक से जानकारी नहीं ली थी। माँ-बाप नहीं थे, इसलिए बहन की शादी की जिम्मेदारी अपने कंधों से जल्द से जल्द उतारने के लिए जो पहला रिश्ता आया उसी जगह बिना कुछ पूछताछ किए रागिनी की शादी कर दी और अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गए।
लगभग एक साल पहले शादी करके ससुराल गई रागिनी को पहले ही दिन समझ में आ गया था कि उसका पति अपनी माँ के आगे कुछ नहीं बोलता। उसकी सास हमेशा उसकी शिकायतें करके उसे उसके खिलाफ भड़काती रहती थीं। फिर उसका पति भी रागिनी से रूखा व्यवहार करने लगता। शादी के आठ-दस दिन बाद से ही यह सब शुरू हो गया था। फिर भी उसने सब कुछ सहते हुए अपने गृहस्थी की शुरुवात बड़ी ही आशाओं के साथ की थी।
उसने सास का दिल जीतने की कोशिश की, पति के मन में जगह बनाने की कोशिश की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। शुरू में उसका पति केवल नाराज़ होकर चुप रहता था, फिर धीरे-धीरे उस पर चिल्लाने लगा और अब तो उस पर हाथ भी उठाने लगा था। एक दिन जब ये सब सहा नहीं गया तो वो घर छोड़कर मायके आ गई।
रागिनी घर में आई और सिया को देखकर बोली—”अरे, मेरी छोटीसी गुड़िया!” कहते हुए उसने उसे गोद में उठा लिया।पहले ही दिन से रागिनी ने सिया का पूरा ध्यान रखना शुरू कर दिया।तब से सिया के जीवन में माँ से भी ज़्यादा करीब कोई था — उसकी बुआ रागिनी। उसे खाना खिलाना, कहानियाँ सुनाना, उसके बाल संवारना, सोते समय लोरी गाना… रागिनी सब करती। सिया उसे “बुआ” न कहकर “बुआ मां”कहने लगी थी।
सिया की माँ माया अब निश्चिंत हो गई थी।”रागिनी है न सिया के लिए,” ये कहते हुए उसने अब सारी जिम्मेदारियों को रागिनी को सौंप दिया।रागिनी सिया को इतना प्यार से संभालती है यह देखकर माया ने कभी उसे वापस ससुराल भेजने की कोशिश नहीं की। न ही किसी ने उसके पति और उसमें हुआ मनमुटाव दूर करने की कोशिश की। अपने कम में उलझे हुए भाई ने भी इस पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया।
उल्टा माया मन ही मन सोचती—”यहीं रहने दे… घर के कामों में भी मदद हो जाती है। और सिया की भी कोई चिंता नहीं।”रागिनी और उसके पति के बीच समझौता कराने की किसी ने कोशिश ही नहीं की। न ही कभी रागिनी का पति उसे वापस लेने आया। कुछ ही दिनों में रागिनी का तलाक हो गया। उस दिन रागिनी बहुत रोई थी। लेकिन सिया ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
“बुआ, तुम मत रो… मैं हूँ न तुम्हारे साथ।”सिया अपनी तोतली बोली में उससे लिपटते हुए बोली।
वह छोटी-सी बच्ची रागिनी के जीवन का सहारा बन गई। सिया पास होती तो रागिनी को दुख बिल्कुल महसूस नहीं होता। रागिनी ने अब सिया को ही अपनी दुनिया बना लिया था।समय आगे बढ़ता गया। घर के सारे काम — खाना बनाना, बर्तन धोना, कपड़े धोना, सफाई — सब रागिनी ही करती। सिया को स्कूल छोड़ना, लाना, उसका पढ़ाई कराना… सब।
माया तो संकेत को लेकर कभी सहेलियों के घर घूमने चली जाती। कभी कभी सहेलियों को घर बुलाकर कहती—
“रागिनी, ज़रा चाय बना देना।
“कभी कहती—”मेरी सहेलियों को तुम्हारे हाथ का खाना बहुत पसंद है।”और उससे सारे काम करवा लेती।
कभी-कभी तो उससे पूरा खाना बनवाकर सहेली के घर डिब्बा भी भेज देती। एक दिन माया की एक सहेली ने उससे पूछा—
“तुम्हारी ननद अब हमेशा यहीं रहेगी क्या? क्या ये तुम्हें ठीक लगता है? क्यों अपने घर-गृहस्थी में ननद की दखलअंदाजी सहते हो। तुम उसकी दूसरी शादी करवा दो और चलता करो इस जिम्मेदारी को अपने घर से।”
माया भौंहें उठाकर बोली—”अरे, यह भी तो ठीक ही है…इसके रहते घर में काम करने के लिए नौकरानी रखने की ज़रूरत नहीं। और इसका कोई खर्च भी नहीं है।”
रागिनी ने यह सब सुन लिया। उसके साथ खड़ी छोटी-सी सिया ने भी यह सुना। उसे सब समझ नहीं आया, पर इतना समझ में आया कि माँ ने बुआ के बारे में कुछ बुरा कहा है। उसके हाथ में पकड़ी चाय की ट्रे हल्की-सी लड़खड़ाई। लेकिन अगले ही पल उसने अपने आपको सम्भल लिया। आँखों के आँसू उँगलियों से पोंछकर ऐसे काम में लग गई जैसे कुछ हुआ ही न हो।पर सिया ने यह सब देख लिया था। उस रात सिया ने रागिनी को गले लगाया।
“बुआ, तुम नौकरानी नहीं हो… तुम तो मेरी माँ हो।”सिया की बात सुनकर रागिनी की आँखों में आँसू आ गए।
“हाँ मेरी लाडो… मैं ही तुम्हारी माँ हूँ,”कहते हुए उसने उसके बालों पर हाथ फेरा।साल बीतते गए। सिया बड़ी होती गई। वह पढ़ाई में बहुत तेज़ थी। उसकी हर सफलता के पीछे उसकी बुआ मां रागिनी थी। सिया को बड़ी होकर डॉक्टर बनना था।वो हमेशा रागिनी से कहती—
“बुआ, मैं बड़ी होकर तुम्हारा बहुत अच्छे से ख्याल रखूंगी। मैं तुम्हें कभी दुखी नहीं होने दूँगी।”उसकी बात सुनकर रागिनी मुस्कुरा देती।
बारहवीं का परिणाम आया और सिया पूरे प्रभाग में प्रथम आई थी। इस खुशी में कॉलेज में उसके सम्मान समारोह रखा गया। उसका सम्मान किया गया और फिर उसे मंच पर भाषण देने बुलाया गया।सिया ने मंच पर जाकर बोलना शुरू किया—
“मेरी सफलता के पीछे सबसे बड़ा हाथ मेरी माँ का है… मेरे जीवन की सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति मेरी माँ हैं…”
सब लोग शांत होकर सुनने लगे। माया गर्वित नजरों से उसे देखने लगी।लेकिन अगले ही पल सिया बोली—
“मेरी माँ यानी… मेरी बुआ रागिनी… मेरी बुआ-माँ।”यह सुनकर सब हैरान रह गए।
सिया आगे बोली—”मेरी बुआ-माँ ने अपना पूरा जीवन मेरी अच्छी परवरिश में लगा दिया।अपना दुख भुलाकर वो सिर्फ मेरे लिए जीती रहीं… हमेशा मेरी ही चिंता करती रहीं…मेरे जीवन में वही मेरी प्रेरणा है…
“सिया ने अपनी बुआ के बारे में दिल खोलकर सब बताया। पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा। यह सब सुनकर रागिनी की आँखों से आँसू बहने लगे।
कार्यक्रम के बाद एक व्यक्ति रागिनी के पास आया।वह था अभिजीत — सिया के कॉलेज का ट्रस्टी।वह शांत स्वर में बोला—
“मैं अभिजीत हूँ। रागिनी और मैं एक ही कक्षा में पढ़ते थे। वह बहुत होनहार छात्रा थी। मुझे लगता था कि आगे चलकर वह ज़रूर बहुत बड़ा नाम कमाएगी। फिर कुछ समय बाद मुझे उसके विवाह की खबर मिली…”वह थोड़ा रुक गया।
“…और उस खबर ने मेरा दिल तोड़ दिया।”
” लेकिन ऐसा क्यों?” सिया ने पूछा।
” मैं रागिनी को स्कूल के दिनों से ही पसंद करता था… लेकिन मैं कभी उससे कह नहीं पाया। मैंने सोचा था कि नौकरी मिलने के बाद उसके घरवालों से उसका हाथ माँगूंगा। लेकिन उसकी शादी की खबर सुनकर मेरी सारी उम्मीदें खत्म हो गईं। फिर मैं पढ़ाई के लिए दूसरे शहर चला गया और वहीं बस गया। बाद में घरवालों की पसंद से मैने शादी कर ली… लेकिन शादी के चार साल बाद बीमारी के कारण मेरी पत्नी का देहांत हो गया।”
वह आगे बोला—”तब से मैंने दोबारा शादी के बारे में कभी नहीं सोचा। लेकिन आज रागिनी को देखकर मेरे मन में फिर से उसे अपने जीवन में लाने की इच्छा हुई है। मैं आज भी यह बात उससे सीधे नहीं कह पा रहा, इसलिए तुमसे कह रहा हूँ। क्या तुम उससे पूछोगी? अगर वह हाँ कहे तो मैं घर आकर रागिनी का हाथ मांगूंगा।”
अभिजीत की बात सुनकर सिया आश्चर्यचकित रह गई। और थोड़ी ही दूरी पर खड़ी रागिनी ने भी उसकी बात सुन ली। वह स्तब्ध रह गई। जीवन के इस मोड़ पर उसने दूसरी शादी के बारे में कभी सोचा ही नहीं था। सिया के अलावा उसने कभी अपने बारे में सोचा ही नहीं था।
बुआ की शादी होगी—इस विचार से ही सिया खुशी से भर गई। जब उसने रागिनी को बताया तो रागिनी ने साफ़ इंकार कर दिया। लेकिन सिया भी अपनी बुआ के जीवन में खुशी लौटाए बिना चुप बैठने वाली नहीं थी।उसने बहुत समझाया, ज़िद की। कहा कि बारहवीं के बाद वह आगे पढ़ने के लिए बाहर जाएगी, तब बुआ अकेली रह जाएँगी।
आखिरकार सिया की ज़िद के सामने रागिनी को मानना पड़ा। फिर अभिजीत ने विधिवत रागिनी के लिए विवाह प्रस्ताव रखा। माया और सिया के पिता के पास इंकार करने का कोई कारण नहीं था।
कुछ दिनों बाद घर में फिर से शादी की खुशियाँ थीं।रागिनी की शादी अभिजीत से हो गई। शादी में सिया खुशी-खुशी रो रही थी। रागिनी ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा।
“तुम नहीं होती तो मैं जी ही नहीं पाती। तुमने मुझे जीने का कारण दिया। तुम कहती थी न कि बड़ी होकर मुझे हमेशा खुश रखोगी… तुमने अपनी बात सच कर दी।””और आप नहीं होतीं तो मैं इतनी समझदार भी नहीं बनती।” सिया मुस्कुराकर बोली।
माया दूर खड़ी यह सब सुन रही थी। उसे पहली बार समझ आया कि असली मायने में रागिनी ही सिया की माँ थी। उसी की वजह से घर में रौनक थी। उसे नौकरानी समझ पूरी उम्र उसकी उपेक्षा करने पर आज माया को बहुत पछतावा हो रहा था।
रागिनी ने अभिजीत के साथ नए जीवन की शुरुआत की और सिया निश्चिंत होकर आगे की पढ़ाई के लिए दूसरे शहर चली गई।रागिनी और सिया दोनों ने ही एक दूसरे के प्रति सच्चे दिल से समर्पण दिया…और उसी अपनेपन को दिल में लेकर दोनों ने अपने-अपने नए जीवन की शुरुआत की।
समाप्त।
©®आरती निलेश खरबड़कर।
