राधा एक गरीब परिवार की साधारण, शांत और समझदार लड़की थी। उसके जीवन में ज्यादा अपेक्षाएँ नहीं थीं—बस एक अच्छी गृहस्थी, प्यार करने वाला पति और सुकून भरी जिंदगी। जब उसकी शादी राजेश से हुई तो उसे लगा कि उसका जीवन अब स्थिर हो गया है।
राजेश एक मध्यमवर्गीय परिवार का सबसे छोटा बेटा था। वह एक छोटी-सी कंपनी में नौकरी करता था। वेतन बहुत ज्यादा नहीं था, लेकिन वो ईमानदार व्यक्ति था। शादी के कुछ ही दिनों में राधा ने अपने प्यारे स्वभाव से उसका दिल जीत लिया था। राजेश को राधा से सच्चा प्यार हो गया था।
इन दोनों की गृहस्थी की शुरुवात तो अच्छी रही थी लेकिन ससुराल वालों का दिल जीतना राधा के लिए इतना आसान नहीं था।
राजेश का बड़ा भाई उदय अपना खुद का व्यवसाय करता था। उसका कारोबार बहुत अच्छा चल रहा था। पैसा, गाड़ी—सब कुछ उसके पास था। उदय की पत्नी रीना एक अमीर घर की बेटी थी। उसके पिता ने ही शुरू-शुरू में उदय को व्यवसाय में बहुत मदद की थी। इसी कारण घर में रीना को बहुत मान-सम्मान मिलता था।
राजेश की माँ तो रीना को जैसे किसी देवी की तरह मानती थीं। उसकी हर बात उन्हें मंजूर होती। वे हमेशा उसके मन का करने की कोशिश करती थीं। जब राधा शादी करके घर आई तो शुरुआत में सब कुछ ठीक लगा। लेकिन कुछ ही दिनों में असलियत सामने आ गई।
“राधा, तुम्हारे शादी करके आने से हमारी जिम्मेदारी थोड़ी कम हो गई है। अब रसोई की जिम्मेदारी मैं तुम्हें सौंपती हूँ। रसोई तुम संभालो… मैं और रीना बाहर के काम देख लेंगे…” सास ने कहा।
उस दिन से रसोई की पूरी जिम्मेदारी राधा पर आ गई।
सुबह से रात तक वह काम में लगी रहती—चाय, नाश्ता, खाना, बर्तन और घर की सफाई। रीना सज-संवरकर बाहर जाती, सहेलियों से मिलती। स्वभाव से वह घमंडी थी। राधा से कभी ठीक से बात भी नहीं करती।
एक बार दोनों साड़ी की दुकान पर साथ गईं। राधा को एक साड़ी पसंद आ गई। तब रीना व्यंग्य से हँसकर बोली—
“अरे, देवर जी की सैलरी देखकर साड़ी पसंद किया करो… नहीं तो महीने भर की तनख्वाह साड़ी में ही उड़ा दोगी।”
यह सुनकर राधा का मन टूट गया। उसने साड़ी की कीमत तक नहीं पूछी और बिना खरीदे ही वापस आ गई।
एक बार रीना की एक सहेली घर आई। राधा ने दिल से उसका स्वागत किया। वह सहेली भी राधा से अच्छे से बात कर रही थी। राधा खुशी-खुशी उससे बातें कर रही थी कि तभी रीना बीच में बोल पड़ी—
“तुम्हें शादी से पहले पता था क्या कि भैया की सैलरी कितनी है?”
राधा एक पल के लिए उदास हो गई, लेकिन फिर शांत होकर बोली—
“ज्यादा नहीं है, लेकिन जितनी भी है हमारे लिए काफी है।”
रीना जोर से हँसी और बोली—
“इतने पैसों में भी कहीं घर चलता है? तुम इस बड़े घर में रहती हो तो सिर्फ इसलिए कि भैया घर का खर्च उठाते हैं। नहीं तो तुम्हारा वो दो कमरों का घर हमने देखा है।”
राधा चुप हो गई। उसे पता था—जहाँ पैसा होता है, वहाँ अक्सर अहंकार भी आ जाता है। उसे बस इतना लगता था कि उसका पति ईमानदार है, उससे प्यार करता है—और वही उसके लिए काफी है। दिन इसी तरह गुजर रहे थे।
एक दिन राधा को लगातार मतली आने लगी और बहुत थकान महसूस होने लगी। सास उसे डॉक्टर के पास ले गईं। वहाँ डॉक्टर ने बताया कि राधा गर्भवती है। यह खबर सुनकर घर में सब खुश हो गए।
लेकिन इस खुशी के साथ राधा के काम में कोई कमी नहीं आई। वह सुबह से रात तक पहले की तरह काम करती रही। राजेश दिन भर बाहर रहता था, इसलिए उसे अंदाज़ा नहीं था कि राधा पर कितना काम है। घर में झगड़ा न हो इसलिए राधा ने उसे कुछ नहीं बताया।
कुछ महीनों बाद सोनोग्राफी में पता चला कि राधा को जुड़वाँ बच्चे होने वाले हैं। यह सुनते ही अचानक रीना का राधा के लिए व्यवहार बदल गया। शादी को पाँच साल हो गए थे, लेकिन रीना और उदय को अभी तक संतान नहीं हुई थी। अब वह राधा से मीठे स्वर में बात करने लगी।
“राधा, तुम थक गई होगी… आओ बैठो, मैं पानी लाती हूँ।”
“कुछ खाने का मन है क्या?”
राधा को थोड़ा आश्चर्य होता, लेकिन उसने कभी शक नहीं किया। उसे लगा कि घर में बच्चा आने वाला है इसलिए भाभी खुश होंगी। नौ महीने धीरे-धीरे गुजर गए। एक दिन राधा को प्रसव पीड़ा शुरू हुई। उसे अस्पताल ले जाया गया। कई घंटों की पीड़ा के बाद राधा ने दो प्यारे बच्चों को जन्म दिया—एक बेटा और एक बेटी।
राजेश ने दोनों बच्चों को गोद में लेकर खुशी से कहा—
“राधा… हमें जुड़वाँ बच्चे हुए हैं… मैं बहुत खुश हूँ।”
राधा भी बहुत खुश थी।
कुछ दिनों बाद वह बच्चों को लेकर घर लौटी। घर में उसका बहुत अच्छा स्वागत हुआ। रीना खाली समय में बच्चों के साथ खेलती थी। एक दिन जब राधा अकेली थी, रीना बोली—
“राधा… मुझे तुमसे एक जरूरी बात करनी है।”
“जी भाभी, कहिए।”
रीना कुछ पल रुकी और बोली—
“तुम्हारे पास दो बच्चे हैं… मुझे उनमें से एक बच्चा गोद दे दो।”
यह सुनकर राधा का दिल धड़कने लगा।
अब उसे समझ में आ गया कि रीना का बदला हुआ व्यवहार क्यों था।
राधा ने शांत होकर कहा—
“मेरे बच्चे आपके भी तो बच्चे हैं। आप दोनों को ही बड़ा कीजिए। लेकिन गोद लेने की क्या जरूरत है?”
रीना बोली—
“मैं उन्हें बड़ा करूँगी, खर्च उठाऊँगी, अच्छी शिक्षा दूँगी… इसलिए मैं अभी कानूनी तौर पर गोद लेना चाहती हूँ।”
राधा ने साफ मना कर दिया—
“माफ कीजिए भाभी… लेकिन मैं अपना बच्चा गोद नहीं दे सकती।”
यह सुनते ही रीना गुस्से में आ गई।
“तुम्हारे पास दो बच्चे हैं, मुझे एक दे दो। जो सुख-सुविधाएँ मैं दे सकती हूँ, वो तुम कभी नहीं दे पाओगी।”
इतने में सास भी वहाँ आ गईं और उन्होंने भी रीना का साथ दिया।
लेकिन राधा अपने फैसले पर अडिग रही—
“मैं अपना बच्चा किसी को नहीं दूँगी।” उसने दृढता से कहा।
उस दिन के बाद घर में तनाव बढ़ गया।
राजेश को भी गलत बात बताई गई और वह कुछ दिन राधा से नाराज़ रहा। लेकिन धीरे-धीरे उसे सच्चाई पता चली। उसने राधा से माफी माँगी।
कुछ महीनों बाद अचानक उदय का व्यवसाय घाटे में चला गया। घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई। उस समय राधा ने कभी किसी से भेदभाव नहीं किया। घर में जो भी बनता, सबके लिए बनाती—रीना के लिए भी उतने ही प्यार से।
एक दिन राधा के बच्चे खेलते-खेलते रीना के पास गए और बोले—
“बड़ी माँ… हमारे साथ खेलो ना!”
“बड़ी माँ” यह शब्द सुनकर रीना की आँखों में आँसू आ गए।
उसे एहसास हुआ कि जिन बच्चों को वह उनकी माँ से अलग करना चाहती थी, वही बच्चे उसे इतना प्यार दे रहे हैं। उस रात वह राधा के पास आई और बोली—
“राधा… मुझे माफ कर दो। मैं पैसे के घमंड में बहुत गलत हो गई थी।”
राधा ने मुस्कुराकर कहा—
“भाभी… आप उनकी बड़ी माँ हैं। अगर मेरे बच्चों को दो माँओं का प्यार मिले, तो इससे बड़ी खुशी क्या होगी?”
यह सुनकर रीना रो पड़ी। उस दिन के बाद रीना सच में बदल गई।
वह राधा की मदद करने लगी और बच्चों से सच्चे दिल से प्यार करने लगी। घर में पहली बार सच में शांति और प्यार का माहौल बन गया।
और राधा को समझ आया—
कभी-कभी किसी को हराकर नहीं, बल्कि माफ करके ही रिश्ते जीते जाते हैं।
समाप्त।
©® आरती निलेश खरबड़कर।
