मन का मैल

मन का मैल

 

पाखी एक खुले विचारों वाली लड़की है। और अपने मम्मी पापा लाडली बेटी है। पाखी के घर में उसके अलावा उसके मम्मी , पापा और भाई रहते थे। कुलमिलाकर एक खुशहाल परिवार है।

आज पाखी के घर में मेहमान आने वाले थे। उसकी दूर की बुआ जी और फूफा जी। इसीलिए पाखी और उसकी मां सुबह से ही तैयारियों में लगी थी। पाखी के पापा मेहमानों को लेने स्टेशन पर गए थे।

कुछ ही देर में मेहमान घर पर आ गए। सबने चाय नाश्ता किया। खाने में अभी थोड़ा वक्त था इसीलिए सब बैठकर बाते करने लगे। पाखी के फूफा जी ने पाखी से उसकी पढ़ाई के बारे में पूछा। पाखी ने भी उन्हें सारी जानकारी दी।

तभी पाखी के फूफा जी ने पाखी के पापा से कहा कि उनकी नजर में पाखी के लिए एक लड़का है। अगर आपको ऐतराज़ ना हो तो मै बात चला सकता हू। पाखी के पापा कुछ कहते इससे पहले ही पाखी ने पूछ लिया।

” लड़का क्या करता है? कितना पढ़ा लिखा है ?”

” इंजीनियर है।” फूफा जी ने गुस्से से कहा।

फूफा जी गुस्सा हो गए है ये पाखी समझ गई। पर उन्हें गुस्सा क्यों आया ये समझ नहीं आ रहा था। इसीलिए वो चुपचाप वहां से निकलकर अपने कमरे में चली गई। जब बुवाजी और फूफाजी घर से जाने लगे तब वह अपने कमरे से आई और उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया। पर फूफाजी अभिभी गुस्से में लग रहे थे।

फूफाजी को उसका लड़के के बारे में पूछना के वह क्या करता है कुछ खास पसंद नहीं आया था। क्यूंकि लड़कियों का अपने होने वाले पति के बारे में ऐसे पूछना उन्हें बदतमीजी लगता था। क्यूंकि उनके जमाने में लड़कियां कभी बड़ों के सामने ऐसे सवाल नहीं करती। फूफाजी के जाने के कुछ दिनों बाद पाखी ये बात भूल गई।

एक दिन पाखी अपने परिवार के साथ किसी रिश्तेदार के शादी में आई थी। संयोगवश फूफाजी भी पूरे परिवार के साथ उसी शादी में आए थे। फूफाजी के दो बेटे थे। उनके बड़े बेटे नीरव की शादी हो चुकी थी। छोटे बेटे कबीर की अभी अभी जॉब लगी थी। उसकी शादी के लिए लड़की की खोज शुरू थी।

कबीर ने पाखी को देखा। लाल रंग की साड़ी पहने पाखी बड़ी सुंदर लग रही थी। कबीर पाखी को बस देखे ही जा रहा था। पाखी की सादगी और उसकी बातो ने कबीर का दिल जीत लिया। कबीर उसे मन ही मन पसंद करने लगा।

जब वो लोग शादी से लौटकर घर गए तो कबीर ने अपनी मां को बताया के वो पाखी को पसंद करता है और उससे शादी करना चाहता है। उसकी मां ने ये बात जब कबीर के पापा को बताई तो उन्होंने इस रिश्ते पर ऐतराज़ जताया। क्यूंकि उन्हें पाखी एक बदतमीज और मुंहफट लड़की लगती थी।

पर कबीर को तो मानो पाखी के अलावा और किसी लड़की से शादी ही नहीं करनी थी। आखिरकार कबीर के पापा इस रिश्ते के लिए बेमन से ही मान गए। कबीर के मम्मी पापा उसका रिश्ता लेकर पाखी के घर गए। पाखी के मम्मी पापा को भी कबीर पसंद आ गया था।और पाखी ने भी शादी के लिए हा कर दी।

पाखी और कबीर की शादी हो गई। वैसे तो पाखी के ससुराल में सारे काम पाखी कि सासुमा ही करती थी क्यूंकि उन्हें ऐसे ही खाली बैठना पसंद नहीं था। पाखी की जेठानी कुछ ज्यादा काम नहीं करती थी। पाखी भी उसकी सासुमा की छोटी मोटी मदत करती रहती। पाखी अब कबीर के परिवार में अच्छे से घुल मिल गई। पर पाखी थोड़ी बातूनी थी। उसके मन में जो भी आता वह तुरंत बोल देती। कबीर के पापा अभी पाखी को मन से स्वीकार नहीं पाए थे। वो पाखी कि जेठानी से काफी अच्छे से बात करते पर पाखी से थोड़े कटे कटे से रहते।

एक दिन अचानक पाखी कि सास बाथरूम में फिसलकर गिर पड़ी। उनके पैर में फ्रैक्चर हो गया। उन्हें पूरे दो महीने का प्लास्टर लगा था। अब सारे कामो की ज़िम्मेदारी पाखी और उसकी जेठानी पर आ गई। पाखी की जेठानी ने घर के कामों से अपना पल्ला झाड़ने के लिए अपनी मां की बीमारी का बहाना बनाया और अपनी मां के घर चली गई।

अब काम कि सारी जिम्मेदारी पाखी पर आ गई थी। पर पाखी ने पूरे घर को बहुत अच्छी तरह से संभाला। शुरुवात में गलतियां तो हुई पर उसकी सास उसे प्यार से समझाती। पाखी घर के सारे काम करती। और अपनी सास की सेवा भी करती। घर में को मेहमान आते उनकी भी अपने मनोभाव से सेवा करती। कबीर भी ऑफिस से आने के बाद पाखी कि थोड़ी बहुत मदद कर देता।

मेहमान तो पाखी कि तारीफ करते नहीं थकते थे। पाखी की सास भी पाखी जैसी बहू पाकर बहुत खुश थी। अब कबीर के पापा को भी पाखी कि अच्छाइयां दिखने लगी थी। उन्होंने सोचा के वो पाखी के बारे में गलत सोच रहे थे। पाखी थोड़ी मुंहफट है पर दिल की बहुत अच्छी है।

पाखी को पहचानने में उनसे गलती हुई है यह बात उन्होंने मान ली। आज उन्हें अपने बेटे कबीर कि पसंद पर गर्व हो रहा था। तबसे उन्होंने पाखी को अपनी बेटी कि तरह माना। उनके मन का मैल अब धूल चुका था।

समाप्त।

©®आरती निलेश खरबडकर.

 

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