
सुजय को गुजरे हुए पन्द्रह दिन हो गये थे। सुरेखा अभी भी इस दुख से खुद को सम्भाल नहीं पाई थी। वो ये बात स्वीकार ही नहीं कर पा रही थी के सुजय अब इस दुनिया में नहीं है। उसकी नौ साल की बेटी सिया भी अभी सदमे में ही थी। पहले तो अपने पापा को खोना और अपनी मम्मी की ऐसी हालत ने उस नन्ही सी जान को सहमा दिया था।
मेहमान भी कुछ दिनों के लिए आए और दुख जाता कर चले गए। सुरेखा को तो मानो अब घर काटने को दौड़ रहा था। तो उसने अपने भाई को कहा के कुछ दिन हम आपके दोनों मां बेटी आपके घर रहने के लिए आ जाते है। अब उसके मायके में उसके भाई की जरा भी नहीं चलती थी। जैसे उसकी भाभी कहती वही होता।
सुरेखा की भाभी को लगा कि एक बार हम सुरेखा और सिया को घर ले जाएंगे तो दोनों की जिम्मेदारी हमेशा के लिए हम पर आ जाएगी, इसलिए भाभी ने अभी हमारे माली हालात ठीक नहीं ये कह कर उसे घर ले जाना टाल दिया। सुरेखा फिर आगे कुछ भी नहीं बोली। उसके भैया भाभी अपने घर चले गए। फिर एक दिन जब उसकी सासू मां को फोन किया तो बातों ही बातों में सुरेखा ने सासू मां से कहा।
” मां…मै और सिया बहुत अकेला महसूस कर रहे है। घर भी मानो काटने को दौड़ता है। कुछ दिनों के लिए आप हमारे पास रहने के लिए आ जाएं ना।”
” नहीं सुरेखा…मैं नहीं रह पाउंगी। अगर मैं वहां आ जाऊंगी तो घर का सारा काम सीमा (सुरेखा की देवरानी) को अकेले करना पडेगा। और मैं यहां कभी ज्यादा रही नहीं तो मेरा यहॉं ध्रुव (सीमा का बेटा) के बिना मन नहीं लगेगा। ” सास ने कहा।
” माँ तो क्या हम दोनों कुछ दिन आपके पास रहने आ जाए?… सुरेखा ने पूछा।
फोन स्पीकर पे था और सुरेखा की देवरानी सीमा वही खड़ी सासू माँ और सुरेखा की बाते सुन रही थी वो झट से बोल पड़ी।
” नहीं दीदी। आपको को तो पता है कि हमारा घर थोड़ा छोटा है। इसलिए तो जेठजी और आप यहां से आपके नए घर में शिफ्ट हो गए थे। और आपके पुराने कमरे में अब बच्चे रहते हैं। आप आयेंगे तो बच्चों को असुविधा होगी। इससे अच्छा है के हम ही आपके घर आते जातें रहेंगें।”
सुरेखा जो पहले से ही काफी दुखी थी वो अपने अपनो के इस व्यवहार से बहोत ज्यादा आहत हुई। जब इस मुश्किल घड़ी में वो साथ नहीं दे पा रहे तो वो कैसे अपने हुए भला। वो अपने मन में सोचती रह गई।
सुरेखा और सुजय की पंद्रह साल पहले अरेंज मैरिज हुई थी। ज्यादा बोलने वाली सुरेखा और शांत स्वभाव का सुजय दोनों का स्वभाव एक दूसरे से एकदम विपरीत था। पर जब दोनों ने एक दूसरे को अच्छे से जाना तब दोनों का प्यार और गहरा होता चला गया।। सुरेखा की सास बहुत सख्त मिजाज की थी। लेकिन सुरेखा ने उन्हें कभी शिकायत का मौका ही नहीं दिया।
सुजय और सुरेखा का वैवाहीक जीवन बड़े अच्छे से कट रहा था। लेकिन शादी के एक साल बाद भी बच्चा ना होने के कारण सुरेखा के ससुराल वाले अब उसे परेशान करने लगे। बच्चा न होने पर उसे बांझ के ताने देने लगे। कुछ दिनों के बाद उसके छोटे देवर की शादी हो गई और एक साल के अंदर उसकी देवरानी ने एक बेटे को जन्म दिया।
घर में बच्चे के आने के कारण सभी खुश थे। सुरेखा तो बहुत ही ज्यादा खुश थी। वैसे भी, उसे छोटे बच्चे बहुत अच्छे लगते। लेकिन सास सुरेखा को छोटे बच्चे के पास नहीं जाने देती। सास की तरह ही सीमा भी अब सुरेखा से बुरा व्यवहार करनें लगी थी। सुरेखा मन हीं मन बच्चे को गोद में लेने के लिए व्याकुल हो उठती। खिलखिलाकर हंसने वाली, बहुत ज्यादा बात करने वाली सुरेखा धीरे-धीरे चुप होती जा रही थी।
सुरेखा ने सुजय से कभी किसी के लहजे की न शिकायत की ना उसके सामने अपना दुख जताया। पर सुजय उसके बताए बिना भी उसका दर्द जानता था। वो ये भी जानता था कि माँ सुरेखा के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करती। इसलिए उसने सुरेखा को लेकर अलग रहने का फैसला किया। वो सुरेखा को यह कहकर घर से निकल गया कि वह पास में ही एक फ्लैट ले लेगा क्योंकि उसका घर अब छोटा पड रहा है।
सुजय और सुरेखा ने अपने नए आशियाने में अपना नया जीवन शुरू किया। दोनों एक दूसरे के साथ खुश तो थे पर कभी कभी बच्चा न होने का दुख होता ही। लेकिन धीरे-धीरे सुजय ने उसके दुख पर अपना प्यार का मरहम लगाया। जैसे-जैसे समय बीतता गया, सुरेखा इस दुःख से बाहर आ रही थी।
सुजय और सुरेखा की शादी के छह साल बाद एक दिन अचानक ही सुजय और सुरेखा को पता चला कि सुरेखा मॉं बनने वाली है। इस खबर से दोनों खुशी से फुले नहीं समा रहे थे। उन्हें तो जैसे दुनिया की सारी खुशियां मिल गई थी। कुछ दिनों बाद सुरेखा ने एक प्यारी सी बच्ची को जन्म दिया और दोनों ने उसका नाम सिया रखा।
पर सुरेखा की सासूमां को जितनी खुशी अपने पोते के जन्म पर हुई थी उतनी खुशी अपनी पोती की जन्म पर नहीं हुई। जब वह सिया को देखने हॉस्पिटल आई तो उन्होंने उसे हाथ में लेकर कहा कि
” इतने सालों बाद उन्हें बच्चा हुआ है लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। भगवान ने बेटी को ही गोद में डाल दिया। कोई बेटा देता तो ठीक होता” सुरेखा और सुजय को उनकी ये बातें बिल्कुल पसंद नहीं आईं। लेकिन दोनों ने फिर भी उन्हें कुछ नहीं कहा।
उस वक्त भी वो सुजय और सुरेखा की खुशियों में दिल से शामिल नहीं हुई थीं और आज जब सुजय इस दुनिया में नहीं है और उनकी पोती और बहू को उनके सहारे की जरूरत है, तो उन्होंने उन दोनों से मानो किनारा कर लिया था। सुरेखा को बहुत अकेलापन महसूस हो रहा था। लेकिन दोनों मॉं बेटी ही एक दूसरे का सहारा बन गई थी। धीरे-धीरे दिन बीत रहे थे और दोनों अपने दुःख से उबर रही थीं।
सुरेखा के पास अब बहुत कम पूंजी बची थी। जब सुजय काम कर रहा था, तो होम लोन, कार लोन और अन्य खर्चों का भुगतान करने के बाद महीने के अंत में उसके पास बहुत कम पैसे बचते। सारा खर्चा उसी जमा किये हुए पैसो से चल रहा था। सारे रिश्तेदार पहले ही मुंह मोड़ चुके थे। सुरेखा ने सोचा कि अब कोई नौकरी ढूंढ लूं। और उसने अब एक दो जगह नौकरी के लिए आवेदन देना भी शुरू कर दिया था। पर एक दिन अचानक एक बीमा एजेंट सूखे घर आया और उसने सुरेखा को बताया कि सुजय ने उसका जीवन बीमा कराया था। और इसीके लगभग एक करोड़ रुपये सुरेखा को मिलने वाले थे।
सुरेखा को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि सुजय ने पहले ही इतने आगे की सोच रखी है। इस पैसे से सुजय की कमी कभी पूरी नहीं होने वाली थी। लेकिन कम से कम भविष्य में उन दोनों को किसी के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पडने वाली थीं।
सुरेखा को सुजय के बीमा से 1 करोड़ रुपये मिलने की खबर सभी रिश्तेदारों के बीच जंगल की आग की तरह फैल गई। जो लोग कभी सुरेखा से प्यार के दो शब्द नहीं बोलते थे वे भी अब खुद ही उससे बात करने आ रहे थे। सुरेखा सबके बदले व्यवहार को भलीभाती जान रही थी। वो ये समझ रही थी कि दुनिया में इंसानों और इंसानियत से ज्यादा महत्व पैसों को है।
एक दिन अचानक उसके भाई और भाभी उसके घर आये। भाभी आकर सुरेखा के गले लग गईं और रोने लगीं। और कहा…
” सुरेखा दीदी…अब हमसे आपकी ये हालत देखी नहीं जा रहीं। आप हमारे साथ घर पर चलो। आप दोनों को वहां बहुत अच्छा लगेगा।”
अपनी भाभी की बात सुनकर सुरेखा ने आश्चर्य से पूछा।
” लेकिन भाभी…जब मैंने आपको पहले कहा था, तो आपने मुझे मना कर दिया था मुझे घर ले जाने के लिए। आपने कहा था कि आप हम दोनों को नहीं रख सकतीं क्योंकि आपके माली हालात अभी कुछ अच्छे नहीं चल रहे।”
” हालात का क्या है। आज अच्छे है तो कल बुरे। लेकिन कोई अपने परिवार को ऐसे थोडी बीच मझधार में छोड़ता है। और पहले मुझे लगा था कि सिया मेरे बच्चों के साथ खुश नहीं होगी। लेकिन अब मैं समझ गई हु के माँ साथ में हों तो बच्चे कहीं भी खुश रहते है। इसलिए कह रहे हैं कि तुम दोनों अभी मेरे साथ घर चलो।” सुरेखा की भाभी ने कहा।
सुरेखा के भाई ने भी अपनी बीवी की हा में हा मिलाई। फिर आगे भाई ने सुरेखा से पूछा।
” सुरेखा… तुम्हें सुजय के बीमा से एक करोड़ रुपये मिले है ना?… तुमने उन पैसों का क्या करने का सोचा है..?
“भैया… मेरे देवरजी नया बिज़नेस शुरू करना चाहते थे इसलिए उन्होंने मुझसे पैसे उधार ले लिए है।” सुरेखा ने जानबूझ कर झूठ बोला।
” क्या ? तुमने अपने देवर को एक करोड़ रुपए दे दिए ? पागल हो क्या ? तुम्हें कुछ पता है या नहीं ? अब वह कोई पैसा वापस नहीं करेगा। इतना पैसा देखकर किसी को भी लालच आ जायेगा।” भैया ने गुस्से से कहा। भाभी भी सुरेखा की ओर गुस्से से देखने लगीं।
उन्होंने कहा कि वे पैसे लौटा देंगे। वो बातें छोडों। आप हमें लेने आए हैं ना ? मैं तुरंत बैग भरकर साथ चलती हू।
” अब इसकी कोई जरूरत नहीं है। जिनको पैसे दिए हैं उन्हीं के पास जाओ बैग लेकर रहने के लिए। पैसे देते वक्त भैया को भाभी की याद नहीं आई? और सहारे के लिए भैया भाभी चाहिए।” भाभी ने गुस्से में कहा। ये कहकर भैया और भाभी दोनों घर से बाहर चले गये।
सुरेखा के एक छोटेसे झूठ के कारण भैया और भाभी के दिल की बात उनके जुबान पर आई थी।
कुछ दिनों के बाद सुरेखा के देवर और सास उसके घर आए। थोड़ी बहुत इधर उधर की बाते करने के बाद उसकी सासू मां ने उससे कहा।
” सुरेखा बेटा…अब सुजय नहीं है तो इसका मतलब ये नहीं है के तुम दोनों का कोई सहारा नहीं है। हम लोग तुम्हारा परिवार हमेशा तुम्हारे साथ है। मैं तो कहती हु के तुम और सिया हमारे साथ ही रहने के लिए चलो। आखिर कबतक तुम दोनों यह अकेली रहोगी?”
सासूमां की बात सुनकर सुरेखा ने आश्चर्य से पूछा,
“लेकिन माँ… हमारा घर तो बहुत छोटा है। ऊपर से हमारे लिए एक भी कमरा खाली नहीं है। फिर हम कैसे आ सकते हैं ? आपको असुविधा नहीं होगी ?”
“तुम दोनों मेरे कमरे में रहना। वैसे भी मेरा कमरा बहुत बड़ा है।जहाँ तुम दोनों आराम से रह सकती हो।” सुरेखा की सास ने कहा।
“ठीक है माँ। मैं तुरंत बैग पैक करना शुरू करती हूँ।” सुरेखा ने कहा।
” भाभी… सब सामान ठीक से भरना। मेरा मतलब है कपड़े और पैसे जो भी हो।” सुरेखा देवर ने कहा।
“पैसे वगैरह तो नहीं हैं। पर बाकी सब सामान ठीक से भर दूंगी। आप चिंता मत कीजिए।” सुरेखा ने कहा।
” तो फिर आपने भैया के बीमा के मिले पैसे कहाँ रखे है ?” देवर ने पूछा।
“मैंने पैसो से सिया के नाम पर बैंक में एफ डी करवाई है। इस पर मिलने वाले ब्याज से सिया की पढ़ाई का खर्च निकल जाएगा। और भविष्य में उसे ही काम आयेंगें।” सुरेखा ने कहा।
“लड़की के नाम पर इतना पैसा निवेश नहीं करना चाहीए। लड़किया तो पराया धन होतीं। उस से अच्छा तुम वो पैसा अपनें देवर को दे दो। वो पैसो का सही जगह इस्तेमाल करेगा। मतलब घर का पैसा घर पर ही रहेगा। और इसके अलावा हम तुम दोनों की जिम्मेदारी उठाएंगे। और तुम सिया की शादी की चिंता मत करना। जब वो बड़ी हो जाएगी तो हम कोई अच्छा लड़का ढूंढ़कर उसकी शादी कर देंगें।” सुरेखा की सास ने कहा।
“लेकिन माँ। पैसों को अभी बैंक से निकाल लेंगे तो थोड़ा नुकसान हो जाएगा। हम फिलहाल के लिए इस बारे में नहीं सोचते है। फिर देखेंगे कि हमें क्या करना है? अभी भला पैसों की बात क्यों ? पहले घर चलते है, इस विषय पर बाद में बात करेंगे।” सुरेखा ने कहा।
“क्या तुमने पैसों को निवेश करने से पहले हमसे पूछा था? घर के बड़ों की सलाह लेना जरूरी नहीं समझा तुमने ? और मेरे बेटे के पैसो पर उसकी मां का भी हक है। और मैं चाहती हु के वो पैसा उसके भाई को मिलना चाहिए। कुछ भी करो और निवेश किया हुआ पैसा वापस लाओ। उसके बिना तुम घर नहीं आ सकती।” सुरेखा की सास ने गुस्से में कहा।
अपनी सास की बात सुनकर सुरेखा को गुस्सा आ गया। उसने कहा...
“माँ… जैसे बेटे के पैसो पर आपका अधिकार है, वैसे ही आपको उसकी ज़िम्मेदारियाँ भी निभानी चाहिए न। जब से सुजय गये है, आपने हमसे कभी हमारा हालचाल भी पुछा है ?कभी मेरी बेटी के सर पर प्यार से हाथ भी फेरा है ? और अब जब मेरे पास पैसे है, तब आपको अपना अधिकार याद आ रहा है ? मुझे आपका झूठा सहारा नहीं चाहिए। हम ऐसे घर में नहीं आना चाहते जहां रिश्तों की कीमत पैसों पर आंकी जाए। हम अब तक जिस तरह से जी रहें हैं वैसे ही आगे भी जी लेंगे। आपने हमारे बारे में इतना सोचा इसलिए आपका धन्यवाद। आप लोग अब जा सकते है।” सुरेखा ने दृढ़ता और आत्मविश्वास से कहा।
सुरेखा की बात सुनकर दोनों सिर झुकाकर वहां से चले गए। लेकिन सुरेखा को दुनिया की ये रीत जानकर बड़ा दुख हुआ के वे उगते सूरज को देखते सलाम करते है और डूबते को पीठ दिखाकर चले जाते है। अगर हमारे हालात बुरे हो तो हमें हमारे अपने भी नहीं पुछतें।
समाप्त।
©®आरती निलेश खरबडकर.
